इक शाम उठाकर साहिल से तुमने बाँधी है ज़ुल्फो मे इक रिबन उठा कर लहरों से, अब सुबह जो खोली हैं जुल्फे इक झरना सा बह निकाला है, इक मौज उजाले की जानां कल कल की सदा मे बहती है.... ये भीगे बाल सुख़ाओ ना, इक बादल की टॉवेल लाकर अब इनको ज़रा सा झटकाओ, अब शाम-ओ-सहर के कुछ छींटे चेहरे पे मेरे तुम बरसाओ.......
हँस के बीमार कर दिया देखो, तुम ने अच्छी भली उदासी को -स्वप्निल तिवारी