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अप्रैल, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शाम-ओ-सहर

इक शाम उठाकर साहिल से तुमने बाँधी है ज़ुल्फो मे इक रिबन उठा कर लहरों से, अब सुबह जो खोली हैं जुल्फे इक झरना सा बह निकाला है, इक मौज उजाले की जानां कल कल की सदा मे बहती है.... ये भीगे बाल सुख़ाओ ना, इक बादल की टॉवेल लाकर अब इनको ज़रा सा झटकाओ, अब शाम-ओ-सहर के कुछ छींटे चेहरे पे मेरे तुम बरसाओ.......

लो नज़्म हुई जानां ..!!

कुछ शोख इशारों से कुछ फूल बहारों से दरिया के किनारों से चंदा से सितारों से कोई नज़्म नहीं बनती .. कुछ शोख इशारे , तुम कुछ फूल बहारें , तुम दरिया के किनारे तुम ये चाँद सितारे ,तुम लो नज़्म हुई जानां ..!!

रोगन

दीवारों से टेक लगाकर गर कुछ देर आराम करो , रंग छूट कर कपड़ों पर आ लगता है.... तेरी रूह पे इक दिन जानां मेरा रोगन लगा मिलेगा , कब से तू भी मेरे दिल पर टेक लगाकर बैठी है ............ !