ऐसी अच्छी सूरत निकली पानी की आँखें पीछे छूट गयीं सैलानी की कैरम हो, शतरंज हो या फिर इश्क़ ही हो खेल कोई हो हमने बेईमानी की दीवारों पर चाँद सितारे ले आये बच्चों ने की भी तो क्या शैतानी की क़ैद हुई हैं आँखें ख़ाब-जज़ीरे पर पा कर एक सज़ा-सी काले पानी की चाँद की गोली रात ने खा ही ली आखिर पहले तो शैतान ने आनाकानी की जलते दिये सा इक बोसा रख कर उसने चमक बढा दी है मेरी पेशानी की मैं उसकी आँखों के पीछे भागा था जब अफ़वाह उड़ी थी उनमें पानी की जब भी उसको याद किया हम बुझ बैठे ‘आतिश’ हमने अक्सर ये नादानी की aisi achchhi soorat nikli pani ki aaNkheN piichhe chhoot gayiiN sailani ki kairam ho, shatranj ho ya fir ishq hi ho khel koi ho hamne be-iimani ki diwaroN par chaaNd sitare le aaye bachchoN ne ki bhi to kya shaitani ki Qaid huii haiN aaNkheN khab-jaziire par pa kar ek saza-sii kale pani ki chaaNd ki goli raat ne kha hi li aakhir pahle to shaitan ne aanakani ki jalte diye sa ik bosah ra...
हँस के बीमार कर दिया देखो, तुम ने अच्छी भली उदासी को -स्वप्निल तिवारी