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aisi achchhi soorat nikli pani ki-ghazal


ऐसी अच्छी सूरत निकली पानी की
आँखें पीछे छूट गयीं सैलानी की

कैरम हो, शतरंज हो या फिर इश्क़ ही हो
खेल कोई हो हमने बेईमानी की

दीवारों पर चाँद सितारे ले आये
बच्चों ने की भी तो क्या शैतानी की

क़ैद हुई हैं आँखें ख़ाब-जज़ीरे पर
पा कर एक सज़ा-सी काले पानी की

चाँद की गोली रात ने खा ही ली आखिर
पहले तो शैतान ने आनाकानी की

जलते दिये सा इक बोसा रख कर उसने
चमक बढा दी है मेरी पेशानी की

मैं उसकी आँखों के पीछे भागा था
जब अफ़वाह उड़ी थी उनमें पानी की

जब भी उसको याद किया हम बुझ बैठे
‘आतिश’ हमने अक्सर ये नादानी की

aisi achchhi soorat nikli pani ki
aaNkheN piichhe chhoot gayiiN sailani ki

kairam ho, shatranj ho ya fir ishq hi ho
khel koi ho hamne be-iimani ki

diwaroN par chaaNd sitare le aaye
bachchoN ne ki bhi to kya shaitani ki

Qaid huii haiN aaNkheN khab-jaziire par
pa kar ek saza-sii kale pani ki

chaaNd ki goli raat ne kha hi li aakhir
pahle to shaitan ne aanakani ki

jalte diye sa ik bosah rakh kar usne
chamak badha di hai meri peshani ki

maiN uski aaNkhoN ke piichhe bhaaga tha
jab afawaah udi thi unmeN pani ki

jab bhi usko yad kiya hum bujh baithe
‘aatish’ hamne aksar ye naadani ki

By - Swapnil Tiwari 'Aatish'

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