सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मेरे होटों को छुआ चाहती है


मेरे होटों को छुआ चाहती है
ख़ामुशी! तू भी ये क्या चाहती है ?
मेरे रस्ते से हटा चाहती है
दिल की दीवार गिरा चाहती है
मेरे कमरे में नहीं है जो कहीं
अब वो खिड़की भी खुला चाहती है
ज़िन्दगी! गर न उधेड़ेगी मुझे
किसलिए मेरा सिरा चाहती है
सारे हंगामे हैं परदे पर अब
फ़िल्म भी ख़त्म हुआ चाहती है
कब से बैठी है उदासी पे मिरी
याद की तितली उड़ा चाहती है
नूर मिट्टी में ही होगा उनकी
‘जिन चरागों को हवा चाहती है’
मेरे अन्दर है उमस इस दरजा
मुझमें बारिश-सी हुआ चाहती है
भोर आई है इरेज़र की तरह
शब की तहरीर मिटा चाहती है
आसमां में हैं सराबों-सी वो
जिन घटाओं को हवा चाहती है
चाँद का फूल है खिलने को फिर
शाम अब शब को छुआ चाहती है
फिर न लौटेगी मिरी आँखों में
नींद रंगों-सी उड़ा चाहती है
सारी दुनिया ही पिघल के ‘आतिश’
मेरे पैकर में ढला चाहती है

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

शाम-ओ-सहर

इक शाम उठाकर साहिल से तुमने बाँधी है ज़ुल्फो मे इक रिबन उठा कर लहरों से, अब सुबह जो खोली हैं जुल्फे इक झरना सा बह निकाला है, इक मौज उजाले की जानां कल कल की सदा मे बहती है.... ये भीगे बाल सुख़ाओ ना, इक बादल की टॉवेल लाकर अब इनको ज़रा सा झटकाओ, अब शाम-ओ-सहर के कुछ छींटे चेहरे पे मेरे तुम बरसाओ.......