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भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

जागते रहो/جاگتے رہو

ख़ुद ही को लगाता हूँ सदा जागते रहो लग जाय न ख़ाबों की हवा जागते रहो خود ہی کو لگاتا ہوں صدا جاگتے رہو لگ جائے نہ خوابوں کی ہوا جاگتے رہو पहले तो मिरी नींद का इक जायज़ा लिया फिर ख़ाब ने चिल्ला के कहा , जागते रहो پہلے تو مری نیند کا اک جائزہ لیا پھر خواب نے چلّا کے کہا جاگتے رہو तुम इश्क़ में हो और अकेले हो ..हो शियार इस शहर में बंदा न ख़ुदा जागते रहो تم عشق میں ہو اور اکیلے ہو  ہوشیار اس شہر میں بندہ نہ خدا جاگتے رہو पहले तो ये अफ़वाह उड़ी ‘ आ रही है रात ’ फिर शोर ये रस्तों पे मचा ’ जागते रहो ’ پہلے تو یہ افواہ اڑی آ رہی ہے رات پھر شور یہ رستوں پہ مچا جاگتے رہی या बंद करो आँखें और उस ख़ाब से लड़ो या यूँ ही रहो खौफ़ज़दा .. जागते रहो یا بند کرو آنکھیں اور اس خواب سے لڑو یا یوں ہی رہو خوفزدہ جاگتے رہو -Swapnil-