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लफ्ज़ मुशायरा

लफ्ज़ का यह मुशायरा पिछले साल जाड़ों में हुआ था... इधर फिर से ब्लॉग पर सक्रिय  हुआ तो सोचा आप लोगों से शेयर किया जाय... 

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भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

शाम-ओ-सहर

इक शाम उठाकर साहिल से तुमने बाँधी है ज़ुल्फो मे इक रिबन उठा कर लहरों से, अब सुबह जो खोली हैं जुल्फे इक झरना सा बह निकाला है, इक मौज उजाले की जानां कल कल की सदा मे बहती है.... ये भीगे बाल सुख़ाओ ना, इक बादल की टॉवेल लाकर अब इनको ज़रा सा झटकाओ, अब शाम-ओ-सहर के कुछ छींटे चेहरे पे मेरे तुम बरसाओ.......