सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

उदासी से सजे रहिये/اداسی سے سجے رہئے -ghazal

उदासी से सजे रहिये
कोई रुत हो हरे रहिये
सभी के सामने रहिये
मगर जैसे छिपे रहिये
किसी दिन हाथ आयेगा
त’अक्कुब में लगे रहिये
जो डूबी है सराबों में
वो कश्ती ढूंढते रहिये
वो पहलू जैसे साहिल है
तो साहिल से लगे रहिये
पड़े रहना भी अच्छा है
मुहब्बत में पड़े रहिये
भंवर कितने भी प्यारे हों
किनारे पर टिके रहिये
समय है गश्त पर हर पल
जहां भी हों छिपे रहिये
ख़ुदा गुज़रे न जाने कब
ख़ला में देखते रहिये
रज़ाई खींचिए सर तक
सहर को टालते रहिये
न जाने कब सहर हो जाय
मुसलसल जागते रहिये
न कट जाये पतंगों सा
फ़लक को देखते रहिये
वो ऐसे होंट हैं के बस
हमेशा चूमते रहिये
यही करता है जी ‘आतिश’
कि अब तो बस बुझे रहिये

اداسی سے سجے رہئے 
کوئی رت ہو ہرے رہئے 

سبھی کے سامنے رہئے 
مگر جیسے چھپے رہئے 

جو ڈوبی ہے سرابوں میں 
وو کشتی ڈھونڈھتے رہئے 
  
وہ  پہلو جیسے ساحل ہے 
تو ساحل سے لگے رہئے 

پڑے رہنا بھی اچّھا ہے 
محبّت میں پڑے رہئے 

بھنور کتنے بھی پیارے ہوں 
کنارے پر ٹیکے رہئے 

سمے ہے گشت پر ہر پاک 
جہاں بھی ہوں چھپے رہئے

خدا گزرے نہ جانے کب 
خلا میں دیکھتے رہئے 

رضائی کھینچیے سر تک 
سحر کو ٹالتے رہئے 

نہ  جانے کب سحر ہو جاۓ 
مسلسل جاگتے رہئے 

نہ کٹ جائے پتنگوں سا 
فلک کو دیکھتے رہئے 

وہ ایسے ہونٹ ہیں کے بس 
ہمیشہ چومتے رہئے 

یہی کرتا ہے جی 'آتش'
کہ اب تو بس بجھے رہئے

टिप्पणियाँ

बहुत ख़ूब.. इस बहर में तुम्हारी ग़ज़ल का मज़ा ही कुछ और है!!

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

जागते रहो/جاگتے رہو

ख़ुद ही को लगाता हूँ सदा जागते रहो लग जाय न ख़ाबों की हवा जागते रहो خود ہی کو لگاتا ہوں صدا جاگتے رہو لگ جائے نہ خوابوں کی ہوا جاگتے رہو पहले तो मिरी नींद का इक जायज़ा लिया फिर ख़ाब ने चिल्ला के कहा , जागते रहो پہلے تو مری نیند کا اک جائزہ لیا پھر خواب نے چلّا کے کہا جاگتے رہو तुम इश्क़ में हो और अकेले हो ..हो शियार इस शहर में बंदा न ख़ुदा जागते रहो تم عشق میں ہو اور اکیلے ہو  ہوشیار اس شہر میں بندہ نہ خدا جاگتے رہو पहले तो ये अफ़वाह उड़ी ‘ आ रही है रात ’ फिर शोर ये रस्तों पे मचा ’ जागते रहो ’ پہلے تو یہ افواہ اڑی آ رہی ہے رات پھر شور یہ رستوں پہ مچا جاگتے رہی या बंद करो आँखें और उस ख़ाब से लड़ो या यूँ ही रहो खौफ़ज़दा .. जागते रहो یا بند کرو آنکھیں اور اس خواب سے لڑو یا یوں ہی رہو خوفزدہ جاگتے رہو -Swapnil-