सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Gayab kamra -nazm

घर के जिस कमरे में जाऊं
इक कमरा, जो ग़ायब है
हर कमरे में साथ मिरे
आ जाता है
....जैसे मेरा साया हो
माज़ी का वो ग़ायब कमरा
बंद ही रहता है अक्सर
जैसे उसको खोलने वाली
उसके ताले के कानों में
‘खुल जा सिम सिम’ कहने वाली
चाभी खो बैठा हूँ कहीं पर..
लेकिन अपने आप कभी उसका दरवाज़ा
मुझको खुला मिलता है तो
मैं उसके अन्दर बैठा घंटों रोता हूँ,
और इक आदमक़द आईने पर जो धूल पड़ी मिलती है
उस पर नाम तिरा लिखता हूँ

گھر کے جس کمرے میں جاوں 
اک کمرہ، جو غایب ہے
ہر کمرے میں ساتھ میرے آ جاتا ہے
جیسے میرا سایہ ہو.......
ماضی کا وو غایب کمرہ 
بند ہی رہتا ہے اکثر
جیسے اسکو کھولنے والی
اسکے تالے کے کانوں میں 
'کھل جا سمسم کہنے والی
چابھی کھو بیٹھا ہوں کہیں پر
لیکن اپنے آپ کبھی 
اسکا دروازہ مجھکو کھلا ملتا ہے تو
گھنٹوں میں اسکے اندر بیٹھا روتا ہوں
اور اک آدامقد آئینے پر جو دھول پدی ملتی ہے
اس پر نام تیرا لکھتا ہوں

टिप्पणियाँ

मुझे याद आता है वो शख्स जो आज के दिन चीख चीख कर सारे रास्तों में घूमता फिर रहा था और गा रहा था - रोको ना, रोको ना, मुझको प्यार करने दो! डार्लिंग आँखों से आँखें चार करने दो!!" और आज वो उस कमरे में बैठा आँसू बहाता है!!
बुलन्दी या तन्हाई!! या बुलन्दी की तन्हाई!!
जो भी है.. मेरी बिछड़ी नज़्म मुझसे बरसों बाद मिली है!! शुक्रिया एक बार फिर मुझे मुझसे मिलाने का!!

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

जागते रहो/جاگتے رہو

ख़ुद ही को लगाता हूँ सदा जागते रहो लग जाय न ख़ाबों की हवा जागते रहो خود ہی کو لگاتا ہوں صدا جاگتے رہو لگ جائے نہ خوابوں کی ہوا جاگتے رہو पहले तो मिरी नींद का इक जायज़ा लिया फिर ख़ाब ने चिल्ला के कहा , जागते रहो پہلے تو مری نیند کا اک جائزہ لیا پھر خواب نے چلّا کے کہا جاگتے رہو तुम इश्क़ में हो और अकेले हो ..हो शियार इस शहर में बंदा न ख़ुदा जागते रहो تم عشق میں ہو اور اکیلے ہو  ہوشیار اس شہر میں بندہ نہ خدا جاگتے رہو पहले तो ये अफ़वाह उड़ी ‘ आ रही है रात ’ फिर शोर ये रस्तों पे मचा ’ जागते रहो ’ پہلے تو یہ افواہ اڑی آ رہی ہے رات پھر شور یہ رستوں پہ مچا جاگتے رہی या बंद करो आँखें और उस ख़ाब से लड़ो या यूँ ही रहो खौफ़ज़दा .. जागते रहो یا بند کرو آنکھیں اور اس خواب سے لڑو یا یوں ہی رہو خوفزدہ جاگتے رہو -Swapnil-