बंद कमरा, मेरे माज़ी का खुला है आज बरसों बाद इस पुराने बंद कमरे की हवा कब की पुरानी पड़ चुकी है एक इक लम्हे पे दीमक लग चुकी है अब यहाँ और हर इक याद पर सीलन लगी है.. सोचता हूँ आज उसको फोन कर लूँ इस तरह कमरे की हर शय को दिखा दूं धूप मैं..
हँस के बीमार कर दिया देखो, तुम ने अच्छी भली उदासी को -स्वप्निल तिवारी