सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

swapnil tiwari 'aatish' लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दबी है कोई दुखती रग खुदाया/ دبی ہے کوئی دکھتی رگ خدایا

दबी है कोई दुखती रग खुदाया ज़मीं ने आसमां सर पर उठाया دبی ہے کوئی دکھتی رگ خدایا زمیں نے آسماں سر پر اٹھایا वो चलता जा रहा था दूर मुझसे घना कुहरा था चारो सिम्त छाया وہ چلتا جا رہا تھا دور مجھ سے گھانا کوہرا تھا چاروں سمت چھایا ये किस की याद-सी है दिल में मेरे ये वीरानों को है किसने सजाया یہ کس کی یاد سی ہے دل میں میرے یہ ویرانوں کو کسنے ہے سجایا अकेला था मैं उस नाटक में शायद कि हर किरदार मैंने ही निभाया اکیلا تھا میں اس ناٹک میں شاید کہ ہر کردار میں نے ہی نبھایا ये दुनिया आ गयी सकते में सारी लतीफ़ा ज़िंदगी नें जब सुनाया یہ دنیا آ گئی سکتے میں ساری لطیفہ زندگی نے جب سنایا न हो फिर जागने में देर मुझको इसी इक बात नें शब भर जगाया نہ ہو پھر جاگنے میں دیر مجھ کو اسی اک بات نے شب بھر جگایا तुम्हारे एक दिन को जज़्ब करके ये ‘ आतिश ’ ज़िंदगी भर जगमगाया تمھارے ایک دن کو جذب کر کے یہ آتش زندگی بھر جگمگایا 

दरीचा/دریچہ

घुटन ही घुटन है फ़ज़ा जैसे इक बोझ उठाये हुए है ये आधा उजाला तो बेहोश सा है अधूरा अँधेरा भी बेहिस पड़ा है यहां के सवेरों में शामें मिली हैं तो रातों में किरनों की किरचें मिलेंगी घुटन ही घुटन है ये तस्वीर तेरी जो दीवार पर है इसे क्या हटा दूँ ? कि मुमकिन है पीछे दरीचा छुपा हो ..... گھٹن ہی گھٹن ہے فضا جیسے اک بوجھ اٹھائے ہوئے ہے یہ آدھ اجالا تو بے ہوش سا ہے ادھورا اندھیرا بھی بے حس پڑا ہے یہاں کے سویروں میں شامیں ملی ہیں تو راتوں میں کرنوں کی کرچیں ملیں گی گھٹن ہی گھٹن ہے یہ تصویر تیری جو دیوار پر ہے اسے کیا ہٹا دوں ؟ کہ ممکن ہے پیچھے دریچہ چھپا ہو....... 

प्रिज़्म और पिरामिड

प्रिज़्म में इक उदासी भरी दुबली-पतली किरन, ऐसे दाख़िल हुई जैसे बाहर न आयेगी अब प्रिज़्म दिखने में तो इक पिरामिड सा ही होता है रौशनी का बदन लेकिन ऐसा नहीं बना कर ममी जिसको रक्खे वहाँ.. प्रिज़्म के सब फलक कोशिशें कर के भी जब बना ही न पाये किरन को ममी तो वो हंसने लगी और हँसते हुए अपनी सतरंगी चादर हवा में उड़ाने लगी...

हमेशा ही मुझको रही हड़बड़ी/ ہمیشہ ہی مجھ کو رہی ہڑبڑی-ghazal

हमेशा ही मुझको रही हड़बड़ी कहीं पर्स छूटा कहीं पर घडी कभी वक़्त भी बाँध पाऊँ यूँ ही कलाई पे बाँधी है जैसे घड़ी तिरी याद के एक झोंके से फिर मिरी नींद आँखों कि छत से उड़ी कि दरिया समंदर का क़ैदी हुआ   रवानी ही इसकी बनी हथकड़ी दिसंबर के जैसा तिरा हिज्र है   हुए छोटे दिन और रातें बड़ी   सहारा फक़त अपने साये का था   सही धूप हमने कड़ी से कड़ी टहलता रहा दिल के कमरे दुःख बजाते हुए अपनी बूढी छड़ी   अगर तुझमें   ' आतिश '  कोई आग है जला कर दिखा दे कोई फुलझड़ी ہمیشہ ہی مجھ کو رہی ہڑبڑی  کہیں پرس چھوٹا کہیں پر گھڑی  تری یاد کے ایک جھونکے سے پھر  مری نیند آنکھوں کی چھت سے اڑی  کبھی وقت بھی باںدھ پاؤں یوں ہی  کلائی پے باندھی ہے جیسے گھڑی  کہ دریا سمندر کا قیدی ہوا  روانی ہی اس کی بنی ہتھکڑی  دسمبر کے جیسا ترا ہجر ہے  ہوئے چھوٹے دن اور راتیں بڑی  ٹہلتا رہا اپنے کمرے میں دکھ  بجاتے ہوئے اپنے بوڑھی چھڑی  سہارا فقط اپنے سایے ک...

عجب نقشہ ہے دیکھو میرے گھر کا/अजब नक़्शा है देखो मेरे घर का- ग़ज़ल

अजब नक़्शा है देखो मेरे घर का हर इक खिड़की पे मंज़र है सहर का मिरे हालात बेहतर हो चले हैं भरोसा कर लिया था इस ख़बर का मिरे सामान में शामिल है मिट्टी इरादा है समन्दर के सफ़र का खड़ी थी वादियों में एक लडकी पहन कर कोट इक यादों के फ़र का पहाड़ों से समंदर तक खिंचा है ये दरिया है कोई टुकड़ा रबर का परिंदा शाख़ पे माज़ी के बैठा किसी की याद है कोटर शजर का बहारो! चादरें ले आओ इनकी बदन उघडा हुआ है हर शजर का कोई जिग्सा पज़ल है दुनिया सारी मैं इक टुकड़ा हूँ, पर जाने किधर का हरी क़ालीन सी इक लॉन में थी और उसपे फूल था इक गुलमोहर का बुझी आख़िर में सारी आग ‘आतिश’ भले ही दोष था बस इक शरर का عجب نقشہ ہے دیکھو میرے گھر کا  ہر اک کھڑکی پے  منظر ہے سحر کا  مرے سامان میں شامل ہے مٹی  ارادہ ہے سمندر کے سفر کا  مرے حالات بہتر ہو چلے ہیں  بھروسہ کر لیا تھا اس خبر کا کھڑی تھی وادیوں میں ایک لڑکی  پہن کر کوٹ اک یادوں کے فر کا  پہاڑوں سے سمندر تک  کھنچا ہے  یہ دریا ہے کوئی ٹکڑا ربر کا ...

रोना आये तो - नज़्म

रोना आये तो जी भर कर रो लेना तुम आँखों में काग़ज़ होते हैं जिनपे खाब लिखे होते हैं अश्कों को गर रोकोगे तुम बहने से वो आँखों में भर जायेंगे धीरे धीरे वो सब कागज़ जिन पर ख़ाब लिखे होते हैं गल जायेंगे रोना आये तो जी भर कर रो लेना तुम..!

एक पुल पर/ ایک پل پر - nazm

वो एक पुल था जहां मिला था मैं आख़िरी बार तुमसे जानां मुझे हमेशा की तरह पुल के उस ओर जाना था मैं जिधर से नदी को जाते हुए निहारूं मगर तुम्हें पुल का वो ही हिस्सा ज़ियादा भाया हमेशा जैसे जिधर से तुम डूबते हुए आफ़ताब को देख सकती थी वहीं पे डूबी थी अपने रिश्ते की आख़िरी नब्ज़ वो एक पुल जो मिला रहा था नदी के इक तट को दूसरे से वहीं मैं तुमसे अलग हुआ था.. وہ ایک پل تھا جہاں ملا تھا  میں آخری بار تم سے جاناں  مجھے ہمیشہ کی طرح  پل کے اس اور جانا تھا میں جدھر سے  ندی کو جاتے ہوئے نہاروں  مگر تمہیں پل کا وہ ہی حصّہ  زیادہ بھیا ہمیشہ جیسے  جدھر سے تم ڈوبتے ہوئے  آفتاب کو دیکھ سکتی تھی  وہیں پے ڈوبی تھی اپنے رشتے کی آخری نبض  وہ ایک پل جو  ملا رہا تھا  ندی کے اک تٹ کو دوسرے سے  وہیں میں تم سے الگ ہوا تھا

ख़ुदकुशी से पहले

दरीचे बंद कर डाले हैं सारे मगर बस इस क़दर कोई नज़ारा नज़र आये न बाहर से कोई झांके तो कुछ भी देख ना पाये मगर थोड़ी जगह मिल जाये मुट्ठी भर हवा को आने जाने की न सुन पाये कोई भी शख्स ये आवाज़ गोली की तो मर जाने पे जब ये जिस्म सड़ने पर तुला हो हवा के हाथ लोगों तक ख़बर पहुंचे लगा के कुण्डी भीतर से रखी हैं मेज़ कुर्सी सामने दरवाज़े के मैंने कि शक हो गर किसी को कि मैं घर आज सिर्फ़ और सिर्फ़ मर जाने को लौटा हूं तो वो भीतर न आ पायें कम अज़ कम मेरे मरने तक सो मैंने फ़ोन को भी एक लम्बी नींद दे दी है पहुँच से सबकी बाहर लबों पर उंगलियाँ रख कर पड़ा है.. है स्लो मोशन में अब ये वक़्त मिरी साँसें भी भारी हो रही हैं मैं नर्वस हो रहा हूँ बस इक गोली जो हो सकती है सीधा सर के पार कि फंस सकती है सर ही में, मेरे उलझे ख़यालों में न इतना सोचता मैं तो बहुत आसान था मरना ये सारे इन्तिज़ाम मुझमें इक शक इक नया डर ले के आये हैं यही डर अब मुझे लगता है मरने भी नहीं देगा..!

फ़ुर्सत

बंद कमरा, मेरे माज़ी का खुला है आज बरसों बाद इस पुराने बंद कमरे की हवा कब की पुरानी पड़ चुकी है एक इक लम्हे पे दीमक लग चुकी है अब यहाँ और हर इक याद पर सीलन लगी है.. सोचता हूँ आज उसको फोन कर लूँ इस तरह कमरे की हर शय को दिखा दूं धूप मैं..

एक शह्र - नज़्म

सपाट चेहरों, उदास लोगों से शह्र अपना बना हुआ है यहाँ मैं बरसों से हूं मगर ख़ुद को इक अजनबी की तरह अकेला ही पा रहा हूं यहाँ तो रस्ते तलक बचा के निगाह मुझसे निकल रहे हैं कि जैसे मुझसे हुए मुख़ातिब तो खाइयों, खंदक़ों में फिसल पड़ेंगे, इमारतें देखती हैं मुझको कि जैसे मैं इश्तिहार हूँ एक फूहड़, अनचाहा, सस्ता और भद्दा कहीं नहीं हूँ नज़र में लोगों की आज भी मैं बस इक ख़ला हूँ मैं उनकी ख़ातिर उग आये हैं हाथ पाँव जिसके ख़लाओं को कोई नाम क्या दे? सपाट चेहरों उदास लोगों से शह्र अपना बना हुआ है कभी भी हँसता न बोलता है पड़ा ही रहता है एक अजगर की तरह जिसने निगल ली हो भीड़ इक किसी दिन…!

एक ही ग़म तेरे जाने का रहा

एक ही ग़म तेरे जाने का रहा एक दिन वो भी मगर जाता रहा आज माँ का जी बहुत अच्छा रहा आज दिन भर रेडियो बजता रहा ख़ाब में खुलती रही खिड़की कोई और उस खिड़की में वो आता रहा लॉन में आया मुझे तेरा खयाल मैं वहीं फिर देर तक बैठा रहा  जह्न के कमरे में तेरा इक खयाल रात भर जलता रहा बुझता रहा  आख़िरश पीला ही पड़ना था अगर दिल का कागज़ बेसबब सादा रहा  एक नन्हा ख़ाब मेरी नींद में पाँव उचकाकर तुझे छूता रहा  इक उचटती सी नज़र उसकी लगी और मैं बिखरा तो फिर बिखरा रहा

याद तुम्हारी शक्कर निकली

धूप के भीतर छुप कर निकली तारीकी* सायों भर निकली रात गिरी थी इक गड्ढे में शाम का हाथ पकड़कर निकली रोया..उससे मिलकर रोया चाहत भेस बदल कर निकली फूल तो फूलों सा होना था तितली कैसी पत्थर निकली सूत हैं घर के हर कोने में मकड़ी पूरी बुनकर निकली ताजादम होने को उदासी लेकर ग़म का शॉवर निकली ग़म के कितने चींटे आये याद तुम्हारी शक्कर निकली हिज्र की शब से घबराते थे यार यही शब बेहतर निकली जब भी चोर मिरे घर आये एक हंसी ही ज़ेवर निकली ‘आतिश’ कुंदन रूह मिली है उम्र की आग में जलकर निकली *तारीकी - अँधेरा 

अपने ख़ाबों को इक दिन सजाते हुए

अपने ख़ाबों को इक दिन सजाते हुए गिर पड़े चाँद-तारों को लाते हुए एक पुल पर खड़ा शाम का आफ़ताब* सबको तकता है बस आते जाते हुए एक पत्थर मिरे सर पे आ कर लगा कुछ फलों को शजर* से गिराते हुए ए ग़ज़ल तेरी महफ़िल में पायी जगह इक ग़लीचा बिछाते-उठाते हुए सुब्ह इक गीत कानों में क्या पड़ गया कट गया दिन वही गुनगुनाते हुए ज़ात से अपनी ‘आतिश’ था ग़ाफ़िल बहुत जल गया ख़ुद दिया इक जलाते हुए आफ़ताब - सूर्य  शजर - पेड़

ख़ाब मेरे घर बैठा है

नींद   से आ कर बैठा है ख़ाब मेरे घर बैठा है अक्स मिरा आईने में लेकर पत्थर बैठा है एक बगूला * यादों का   खा कर चक्कर बैठा है उसकी नींदों पर इक ख़ाब तितली बन कर बैठा है रात की टेबल बुक करके   चाँद डिनर पर बैठा है आ जाता है बाहर भी दिल में जो डर बैठा है अँधियारा खामोशी से ओढ़ के चादर बैठा है आतिश ’ धूप गयी कब की घर में क्यूँ कर बैठा है ? बगूला - चक्रवात