सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दबी है कोई दुखती रग खुदाया/ دبی ہے کوئی دکھتی رگ خدایا

दबी है कोई दुखती रग खुदाया
ज़मीं ने आसमां सर पर उठाया

دبی ہے کوئی دکھتی رگ خدایا
زمیں نے آسماں سر پر اٹھایا

वो चलता जा रहा था दूर मुझसे
घना कुहरा था चारो सिम्त छाया

وہ چلتا جا رہا تھا دور مجھ سے
گھانا کوہرا تھا چاروں سمت چھایا

ये किस की याद-सी है दिल में मेरे
ये वीरानों को है किसने सजाया

یہ کس کی یاد سی ہے دل میں میرے
یہ ویرانوں کو کسنے ہے سجایا

अकेला था मैं उस नाटक में शायद
कि हर किरदार मैंने ही निभाया

اکیلا تھا میں اس ناٹک میں شاید
کہ ہر کردار میں نے ہی نبھایا

ये दुनिया आ गयी सकते में सारी
लतीफ़ा ज़िंदगी नें जब सुनाया

یہ دنیا آ گئی سکتے میں ساری
لطیفہ زندگی نے جب سنایا

न हो फिर जागने में देर मुझको
इसी इक बात नें शब भर जगाया

نہ ہو پھر جاگنے میں دیر مجھ کو
اسی اک بات نے شب بھر جگایا

तुम्हारे एक दिन को जज़्ब करके
ये आतिशज़िंदगी भर जगमगाया

تمھارے ایک دن کو جذب کر کے

یہ آتش زندگی بھر جگمگایا 

टिप्पणियाँ

Fursatnama ने कहा…
ये दुनिया आ गयी सकते में सारी
लतीफ़ा ज़िंदगी नें जब सुनाया....

आह! क्या आला शेर है!

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

Earth hour (नज़्म/نظم)

मेरी ख़ाहिश है हर महीने में रात इक इस तरह की हो जिसमें शह्र की सारी बत्तियां इक साथ एक घंटे को चुप करा दी जाएँ शह्र के लोग छत पे भेजे जाएँ और तारों से जब नज़र उलझे तब अँधेरे का हुस्न उन पे खुले कहकशाँ टूट कर गिरे सब पे सब की आँखों के ज़ख्म भर जाएँ …. मुझ को गर इंतेख़ाब करना हो मैं अमावास की रात को चुन लूँ चाँद की ग़ैरहाज़िरी में ये बात साफ़ शायद ज़ियादा हो हम पे ‘ अपना नुक़सान कर लिया है बहुत हमने ईजाद रौशनी कर के ’` میری خواہش ہے ہر مہینے میں رات اک اس طرح کی ہو جس میں شہر کی ساری بتیاں اک ساتھ ایک گھنٹے کو چپ کرا دی جایں شہر کے لوگ چھت پے بھیجے جایں ان کی تاروں سے جب نظر الجھے تب اندھیرے کا حسن ان پے کھلے کہکشاں ٹوٹ کر گری ان پر انکی آنکھوں کے زخم بھر جائیں مجھ کو گر انتخاب کرنا ہو میں اماوس کی رات کو چن لوں چاند کی غیر حاضری میں یہ بات صاف شاید زیادہ ہو ہم پر اپنا نقصان کر لیا ہے بہت ہم نے ایجاد روشنی کر کے -Swapnil-