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भोर

सूरज
नयी सुबह की
दहलीज़ पे खड़ा है
और एक नज़्म
मेरी दहलीज़ पे,

तुम आओ
कुण्डी खोलो
दोनों तरफ उजाला हो...!

टिप्पणियाँ

स्वप्निल जी........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती
बहुत ही खूबसूरत शब्‍दों का संगम
vandana gupta ने कहा…
वाह ……क्या बात कही है।
नज़्म की कुंडी पहले ... नज़्म सूरज चाँद धूप छाँव सब लिए आती है
shikha varshney ने कहा…
क्या बात है ...वाह..
Sunil Kumar ने कहा…
वाह क्या बात है , बहुत खुबसूरत.....
शिवा ने कहा…
स्वप्निल जी
बहुत ही सुंदर रचना .
Kailash Sharma ने कहा…
बहुत खूब! कुछ शब्दों में बहुत कुछ कह दिया..
Deepak Saini ने कहा…
वाह क्या उजाला है
शुभकामनाये
मनोज कुमार ने कहा…
सुंदर नज़्म।
pallavi trivedi ने कहा…
just beautiful...love it.
इधर भी उजाला हुआ तुम्हारी नज़्म का ;)
बेनामी ने कहा…
awwwwww........daddyyyyyyyyyyyyy ;)
रंजू भाटिया ने कहा…
वाह बहुत खूब ...बहुत सुन्दर
sonal ने कहा…
लिखने का मूड बनाने के लिए इतना ही काफी है ....शायद उस उजाले में कोई नज़्म पनप जाए
Avinash Chandra ने कहा…
मीठी सी सुबह :)
Ravi Shankar ने कहा…
हो गया उजाला…… :)

कैसे हैं गुरु ??
वाह, चमत्कृत करती पंक्तियां।

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