सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

चांदनी मुझ से भी कभी बिखरे/چاندنی مجھ سے بھی کبھی بکھرے

चांदनी मुझ से भी कभी बिखरे
दाग़ मुझ में हैं चाँद से गहरे

चोट करते हुए छुपा दी थी
अपनी तस्वीर घाव में तेरे

धूप की इक नदी में उतरा हूँ
ले के पलकों पे ख़्वाब के क़तरे

ये शरर ही कहानियां हैं मिरी
उड़ते हैं जो अलाव से मेरे

वरना मरकज़ नहीं मैं नुक़्ता हूँ
मुझको रहते हैं दायरे घेरे

एक रनवे पे दौड़ते हैं हम
और रोज़े-अज़ल के हैं उतरे

कब तलक मैं हरा रहूँगा भला
चार जानिब हैं काठ के चेहरे

उस के सब राज़दार डूब गए
शाम के राज़ थे बड़े गहरे

शोर करते हैं जिस्म की तह में
तेरे ख़ामोश लम्स के क़तरे

बीच रस्ते में इक सराय मिली
अश्क गालों पे आ के टुक ठहरे


چاندنی مجھ سے بھی کبھی بکھرے
داغ میرے ہیں چاند سے گہرے

چوٹ کرتے ہوئے چھپا دی تھی
اپنی تصویر گھاؤ میں تیرے

دھوپ کی اک ندی میں اترا ہوں
لے کے پلکوں پہ خواب کے قطرے

یہ شرر ہی کہانیاں ہیں مری
اڑتے ہیں جو الاؤ سے میرے

ورنہ مرکز نہیں میں نقطہ ہوں
مجھ کو رہتے ہیں دائرے گھیرے

ایک رن وے پہ دوڑتے ہیں ہم
اور روزے ازل کے ہیں اترے

کب تلک میں ہرا راہوں گا بھلا
چار جانب ہیں کاٹھ کے چہرے

اس کے سب رازدار ڈوب گئے
شام کے راز تھے بڑے گہرے

شور کرتے ہیں جسم کی تہ میں
تیرے خاموش لمس کے قطرے

بیچ راستے میں اک سراۓ ملی
اشک گالوں پر آ کے ٹک ٹھہرے

-swapnil tiwari-

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

Earth hour (नज़्म/نظم)

मेरी ख़ाहिश है हर महीने में रात इक इस तरह की हो जिसमें शह्र की सारी बत्तियां इक साथ एक घंटे को चुप करा दी जाएँ शह्र के लोग छत पे भेजे जाएँ और तारों से जब नज़र उलझे तब अँधेरे का हुस्न उन पे खुले कहकशाँ टूट कर गिरे सब पे सब की आँखों के ज़ख्म भर जाएँ …. मुझ को गर इंतेख़ाब करना हो मैं अमावास की रात को चुन लूँ चाँद की ग़ैरहाज़िरी में ये बात साफ़ शायद ज़ियादा हो हम पे ‘ अपना नुक़सान कर लिया है बहुत हमने ईजाद रौशनी कर के ’` میری خواہش ہے ہر مہینے میں رات اک اس طرح کی ہو جس میں شہر کی ساری بتیاں اک ساتھ ایک گھنٹے کو چپ کرا دی جایں شہر کے لوگ چھت پے بھیجے جایں ان کی تاروں سے جب نظر الجھے تب اندھیرے کا حسن ان پے کھلے کہکشاں ٹوٹ کر گری ان پر انکی آنکھوں کے زخم بھر جائیں مجھ کو گر انتخاب کرنا ہو میں اماوس کی رات کو چن لوں چاند کی غیر حاضری میں یہ بات صاف شاید زیادہ ہو ہم پر اپنا نقصان کر لیا ہے بہت ہم نے ایجاد روشنی کر کے -Swapnil-