सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

کسی نے بھی نہ مری ٹھیک ترجمانی کی/किसी ने भी न मिरी ठीक तर्जुमानी की

किसी ने भी न मिरी ठीक तर्जुमानी की
धुंआ धुआँ हैं फ़ज़ा मेरी हर कहानी की

चलो ! निकालो मिरे पाँव में चुभा तारा
ज़मीं की सत्ह तुम्हीं ने तो आसमानी की

ये वक़्त लंबे दिनों का है सो ये रातें अब
बढ़ा रही हैं उदासी ही रातरानी की

मैं रो के उट्ठा तो आँखों से रेत झड़ने लगी
कि तिशनगी ही वसीयत है खारे पानी की

नदी किनारे लगा देती थी, सो क्या करते
किसी तरह से भंवर हमने ज़िंदगानी की

तिरा ख़याल हुआ कैनवस पे मेहमाँ कल
तमाम रंगों ने मिलजुल के मेज़बानी की

गुनाहे-इश्क़ किया और कोई सज़ा न हुई!
ज़ुरुर तुम ने सुबूतों से छेड़खानी की


کسی نے بھی نہ مری ٹھیک ترجمانی کی
دھواں دھواں ہے فضا میری ہر کہانی کی

چلو ! نکالو مرے پاؤں میں چبھا تارا
زمیں کی سطح تمہی نے تو آسمانی کی

یہ وقت لمبے دنوں کا ہے سو یہ راتیں اب
بڑھا رہی ہیں اداسی ہی رات رانی کی

میں رو کے اٹھا تو آنکھوں سے ریت جھڑنے لگی
کہ تشنگی ہی وصیت ہے کھارے پانی کی

ترا خیال ہوا کینوس پہ مہماں کل
تمام رنگوں نے مل جل کے میزبانی کی

گناھ عشق کیا اور کوئی سزا نہ ہوئی
زرور تم نے ثبوتوں سے چھیڑخانی کی

टिप्पणियाँ

Fursatnama ने कहा…
तिरा ख़याल हुआ कैनवस पे मेहमाँ कल
तमाम रंगों ने मिलजुल के मेज़बानी की
वा‍‍ह.....वाह....वाह!
बहुत खूब स्वप्निल! सिर्फ़ आप ही ऐसी लफ्ज़ों की मेजबानी कर सकते हैं!!

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

Earth hour (नज़्म/نظم)

मेरी ख़ाहिश है हर महीने में रात इक इस तरह की हो जिसमें शह्र की सारी बत्तियां इक साथ एक घंटे को चुप करा दी जाएँ शह्र के लोग छत पे भेजे जाएँ और तारों से जब नज़र उलझे तब अँधेरे का हुस्न उन पे खुले कहकशाँ टूट कर गिरे सब पे सब की आँखों के ज़ख्म भर जाएँ …. मुझ को गर इंतेख़ाब करना हो मैं अमावास की रात को चुन लूँ चाँद की ग़ैरहाज़िरी में ये बात साफ़ शायद ज़ियादा हो हम पे ‘ अपना नुक़सान कर लिया है बहुत हमने ईजाद रौशनी कर के ’` میری خواہش ہے ہر مہینے میں رات اک اس طرح کی ہو جس میں شہر کی ساری بتیاں اک ساتھ ایک گھنٹے کو چپ کرا دی جایں شہر کے لوگ چھت پے بھیجے جایں ان کی تاروں سے جب نظر الجھے تب اندھیرے کا حسن ان پے کھلے کہکشاں ٹوٹ کر گری ان پر انکی آنکھوں کے زخم بھر جائیں مجھ کو گر انتخاب کرنا ہو میں اماوس کی رات کو چن لوں چاند کی غیر حاضری میں یہ بات صاف شاید زیادہ ہو ہم پر اپنا نقصان کر لیا ہے بہت ہم نے ایجاد روشنی کر کے -Swapnil-