सोमवार, 6 दिसंबर 2010

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ


जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ
अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ

चाँद रहा हूँ माँ की खातिर
यानी बनने में बिगड़ा हूँ

मैं अपने मन के कमरे में
जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ

मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन
मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ

दूर तलक उखड़ी है मिट्टी
मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ

दिल में वो उतना ही आये
शहरों से जितना झगड़ा हूँ

“आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं?
तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

32 टिप्‍पणियां:

सागर ने कहा…

अपने दायरे में, यानि अनुशाषित होकर आप अच्छा प्रयोग करते रहते हैं... बहुत सुन्दर... इसी की जरुरत है और गुंजाईश भी बनती है ... बुरा ना मानें अबकी थोड़ी कमजोर है लेकिन मैं होलसम कह रहा हूँ, आपके पिछले रेकोर्ड को देखते हुए ... इसे हौसला अफजाई समझें...

saanjh ने कहा…

luv u daddy.....chaand wala sher to kamaal tha....great !

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

ग़ज़ल के प्रति रूचि बढ़ रही है आपकी ग़ज़लों को पढ़ कर! सुन्दर शेर हैं आतिश भाई...

Sonal Rastogi ने कहा…

क्या बात है एक एक शेर गज़ब ...
मेरे भीतर ना आ जाएँ ,
शहरों से कितना झगडा हूँ ।
ये लड़ाई जो ज़िन्दगी भर की है

वन्दना ने कहा…

बहुत ही सुन्दर गज़ल्।

shikha varshney ने कहा…

मैं अपने मन के कमरे में,
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ ।

चाँद रहा हूँ माँ की खातिर,
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ
ये ख़याल आते कहाँ से हैं तुम्हें ? बहुत गहरे उतर गए इस बार तो.

केवल राम ने कहा…

मैं अपने मन के कमरे में,
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ ।
xxxxx
बहुत बढ़िया भाई ...कमरे में बेहोश होना ..और वो भी मन के ...बहुत खूब

mridula pradhan ने कहा…

bahut achchi lagi.

संजय भास्कर ने कहा…

वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

डॉ .अनुराग ने कहा…

मेरे भीतर ना आ जाएँ ,
शहरों से कितना झगडा हूँ ।

सुभानाल्लाह........दिल ले गए इस बार .......ओर ये कातिल सा....

vandana ने कहा…

मैं अपने मन के कमरे में,
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ ।

चाँद रहा हूँ माँ की खातिर,
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ ।

य दोनों शेर तो एक दम कातिल हैं ..बहुत बढ़िया

मनोज कुमार ने कहा…

अच्छी ग़ज़ल, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
विचार-प्रायश्चित

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

वाह लाजवाब शब्दों के चयन ने गज़ल को प्रभाव्शाली बना दिया है.

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

अगली बार आना तो वो कलम साथ लाना या फिर वो लैपटॉप..चूमने को दिल करता है!!

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

umda gazal...
sabhi sher achchhe..
chhote bahar me badi baaten kahne ka pryas safal ho raha hai.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मैं अपने मन के कमरे में,
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ

चाँद रहा हूँ माँ की खातिर,
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ

बहुत खूब ... गजब के शेर हैं निकाले हैं .. आपकी कहन दिल ले गयी ...

Majaal ने कहा…

छाँट छाँट के ख्याल बाँधे है साहब ;)
लिखते रहिये ...

Taru ने कहा…

मैं अपने मन के कमरे में,
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ

ye sher to main kabhi nahin bhoolne waali......bahut baar haar waar kar ajeeb si feeling aati hai naa....na jeete ban pata hai na marte..tab k liye ye sher suitable hai..:)


aur Chand wala sher bhi ghazab ka hua.......

is baar ghazal zara feeki lagi re...x-(...likhte waqt dhyaan kidhar tha...tera..:P hehhehe....

baharhaal...badhayi shadhayi bhaiyya ghaal k liye...um to itti bhi ni likh sakte...:):):)

Taru ने कहा…

arre ~! woh shaharon k jhgda wala sher bhi bada achhha hai re..;):)

donkey monkey ;P

Rajeev Bharol ने कहा…

बहुत ही बढ़िया..

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

चाँद रहा हूँ माँ की खातिर,
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ ।

बहुत खूब ....!!


मेरे भीतर ना आ जाएँ ,
शहरों से कितना झगडा हूँ ।

छोटी बहर में खूबसूरत शे'र .... .....

mahendra verma ने कहा…

चाँद रहा हूँ माँ की खातिर,
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ ।

मेरे भीतर ना आ जाएँ ,
शहरों से कितना झगडा हूँ ।

ये शे‘र बहुत अच्छे लगे।...पूरी ग़ज़ल काफी सुंदर बन पड़ी है।

सतीश सक्सेना ने कहा…

मैं अपने मन के कमरे में,
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ ।

बहुत खूब आतिश ,
शुभकामनायें आपको

shekhar suman ने कहा…

मैंने अपना पुराना ब्लॉग खो दिया है..
कृपया मेरे नए ब्लॉग को फोलो करें... मेरा नया बसेरा.......

Apanatva ने कहा…

ati sunder........

Apanatva ने कहा…

ati sunder........

Apanatva ने कहा…

ati sunder........

Apanatva ने कहा…

ati sunder........

Apanatva ने कहा…

ati sunder........

Apanatva ने कहा…

ati sunder........

aanch ने कहा…

:)