जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा
हूँ
अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ
चाँद रहा हूँ माँ की खातिर
यानी बनने में बिगड़ा हूँ
मैं अपने मन के कमरे में
जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ
मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही
अर्जुन
मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ
दूर तलक उखड़ी है मिट्टी
मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ
दिल में वो उतना ही आये
शहरों से जितना झगड़ा हूँ
“आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं?
तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ
टिप्पणियाँ
मेरे भीतर ना आ जाएँ ,
शहरों से कितना झगडा हूँ ।
ये लड़ाई जो ज़िन्दगी भर की है
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ ।
चाँद रहा हूँ माँ की खातिर,
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ
ये ख़याल आते कहाँ से हैं तुम्हें ? बहुत गहरे उतर गए इस बार तो.
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ ।
xxxxx
बहुत बढ़िया भाई ...कमरे में बेहोश होना ..और वो भी मन के ...बहुत खूब
शहरों से कितना झगडा हूँ ।
सुभानाल्लाह........दिल ले गए इस बार .......ओर ये कातिल सा....
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ ।
चाँद रहा हूँ माँ की खातिर,
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ ।
य दोनों शेर तो एक दम कातिल हैं ..बहुत बढ़िया
विचार-प्रायश्चित
sabhi sher achchhe..
chhote bahar me badi baaten kahne ka pryas safal ho raha hai.
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ
चाँद रहा हूँ माँ की खातिर,
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ
बहुत खूब ... गजब के शेर हैं निकाले हैं .. आपकी कहन दिल ले गयी ...
लिखते रहिये ...
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ
ye sher to main kabhi nahin bhoolne waali......bahut baar haar waar kar ajeeb si feeling aati hai naa....na jeete ban pata hai na marte..tab k liye ye sher suitable hai..:)
aur Chand wala sher bhi ghazab ka hua.......
is baar ghazal zara feeki lagi re...x-(...likhte waqt dhyaan kidhar tha...tera..:P hehhehe....
baharhaal...badhayi shadhayi bhaiyya ghaal k liye...um to itti bhi ni likh sakte...:):):)
donkey monkey ;P
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ ।
बहुत खूब ....!!
मेरे भीतर ना आ जाएँ ,
शहरों से कितना झगडा हूँ ।
छोटी बहर में खूबसूरत शे'र .... .....
बन बन कर ऐसे बिगड़ा हूँ ।
मेरे भीतर ना आ जाएँ ,
शहरों से कितना झगडा हूँ ।
ये शे‘र बहुत अच्छे लगे।...पूरी ग़ज़ल काफी सुंदर बन पड़ी है।
देखो ना बेहोश पड़ा हूँ ।
बहुत खूब आतिश ,
शुभकामनायें आपको