शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

کیسی کیسی خوبصورت کتنی پیاری مچھلیاں/कैसी कैसी ख़ूबसूरत कितनी प्यारी मछलियाँ



कैसी कैसी ख़ूबसूरत कितनी प्यारी मछलियाँ
जाल में पानी के फँस जाती हैं सारी मछलियाँ
शाम होते ही उदासी चल पड़ी चुनने उन्हें
दिन के साहिल पर पड़ी हैं ग़म की मारी मछलियाँ
दिल के दरिया में जो आई शाम चारा फेंकनें
सत्ह पर आने लगीं यादों की सारी मछलियाँ
अश्क गर सूखे तो सारे ख़ाब मारे जायेंगे
सह नहीं पाएंगी इतनी अश्कबारी मछलियाँ
इक जज़ीरा बस वही सारे समंदर में है पर
ताक में बैठी हुई हैं वां शिकारी मछलियाँ
ख़ुश नहीं हूँ पार करके भी तुम्हे मैं जाने क्यूँ
ओ समंदर ! याद आती हैं तुम्हारी मछलियाँ
کیسی کیسی خوبصورت کتنی پیاری مچھلیاں
جال میں پانی کے پھنس جاتی ہیں ساری مچھلیاں
شام ہوتے ہی اداسی چل پڑی چننے انھیں
دل کے ساحل پر پڑی ہیں غم کی ماری مچھلیاں
دل کے دریا میں جو آی شام چارہ پھینکنے
سطح پر آنے لگیں یادوں کی ساری مچھلیاں
اشک گر سوکھے تو سارے خواب مارے جائنگے
سہ نہیں پائنگی اتنی اشکباری مچھلیاں
اک جزیرہ بس وہی سارے سمندر میں ہے پر
تاک میں بیٹھی ہی ہیں واں شکاری مچھلیاں
خوش نہیں ہوں پار کرکے بھی تمہیں میں جانے کیوں
او سمندر ! یاد آتی ہیں تمھاری مچھلیاں
-swapnil-

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

मौसमे-हिज्र का हर वार संभाले हुए हैं/موسم ہجر کا ہر وار سنبھالے ہوئے ہیں

मौसमे-हिज्र का हर वार संभाले हुए हैं
हम तिरी याद की बौछार संभाले हुए हैं
موسم ہجر کا ہر وار سنبھالے ہوئے ہیں
ہم تری یاد کی بوچھار سنبھالے ہوئے ہیں
दश्त के हो चुके सारे कि जो दीवाने थे
हुस्ने-जानाँ को तो हुशियार संभाले हुए हैं
دشت کے ہو چکے سارے کہ جو دیوانے تھے
حسن جاناں کو تو ہوشیار سنبھالے ہوئے ہیں
इश्क़ और मैं तो हमआहंग हैं कब से कि मुझे
उसकी ऊँगली से जुड़े तार संभाले हुए हैं
عشق اور میں تو ہم آہنگ ہیں کب سے کہ مجھے
اسکی انگلی سے جوڈے تار سنبھالے ہوئے ہیں
तुम गुज़र सकते हो कतरा के सफ़ीने वालो
हम तो दरिया हैं सो मँझधार संभाले हुए हैं
تم گزر سکتے ہو کترا کے سفینے والو
ہم تو دریا ہیں سو منجھدھار سنبھالے ہوئے ہیں
वो किसी और फ़साने ही से हैं वाबस्ता
मुझ-कहानी को जो किरदार संभाले हुए हैं
وو کسی اور فسانے ہی سے ہیں وابستہ
مجھ کہانی کو جو کردار سنبھالے ہوئے ہیں
गिर के टूटेगी अभी एक छनाके के साथ
इक हंसी जिसको ये रुख़सार संभाले हुए हैं
گر کے ٹوتگی ابھی ایک چھناکے کے ساتھ
اک ہنسی جس کو یہ رخسار سنبھلے ہوئے ہیں
नींव से शोर सा उठता है इक ‘हैया हो’ का
ये वो साये हैं जो दीवार संभाले हुए हैं
نیو سے شور سا اٹھتا ہے اک ہےیا ہو کا
یہ وو سائے ہیں جو دیوار سنبھالے ہوئے ہیں
इक ख़ज़ाना सा तहे-आब दबा है जानां
दीदा-ए-तर तिरा दीदार संभाले हुए हैं
اک خزانہ سا تہ آب دبا ہے جاناں
دیدۂ تر ترا دیدار سنبھالے ہوئے ہیں 
-swapnil-

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

सोन मछली-कहानी

एक शह्र था जिसमें थोड़ी सी दिल्ली, थोड़ी मुंबई, थोडा बनारस, थोडा कलकत्ता, थोडा पटना, इत्यादि ठीक वैसे ही थे जैसे दिल्ली में थोडा पटना, थोडा कलकत्ता, थोडा बनारस इत्यादि हैं। उस शह्र में शायद बिहार का या उत्तर प्रदेश का या शायद मध्यप्रदेश का एक लड़का था, जो शायद आई ए एस, या आय आय टी, या शायद एम् बी बी एस की तैयारी कर रहा था। वह तैयारी करता जा रहा था, परीक्षा देता जा रहा था, लेकिन क़िस्मत हमेशा उससे कतरा के निकल जा रही थी। उम्र एक ऐसी रेत-घड़ी है जिसे ऊपर की सारी रेत नीचे गिर जाने के बाद उल्टा नहीं किया जा सकता और यही बात उसे खाए जा रही थी। उसने हर तरीका आज़मा लिया था। मंदिरों में मन्नत मांग कर, पीपल पे धागे बाँध कर, दरगाह में चादर चढ़ कर, बाहों पर ताबीज़ बंधवा कर, चर्च में मोमबत्तियां जला कर वह थक चुका था। लेकिन किसी भी तरह के ख़ुदा से उसे मदद नहीं मिली थी। कुछ और टोटके भी किये थे उसने। होटल खाना खाने जाता तो एक रोटी बचा के ले आता और गौमाता को खिलाता था। मंगलवार को व्रत रखता था। कमरे से परीक्षा देने के लिए निकलता था तो ख़ुद ही दो गिलासों में पानी भर के दरवाज़े के दोनों तरफ़ रखता और दही चाट लेता ताकि परीक्षा अच्छी जाय। लेकिन कोई भी टोटका कारगर नहीं हुआ था। समय बीतता जा रहा था, किताबें बढती जा रही थीं और बाल झड़ते जा रहे थे और इन सबके बीच हर साल एक बार पीलिया भी मेहमान की तरह आ जाती थी कुछ हफ्ते रहती थी और उसकी सारी मेहनत बर्बाद करके चली जाती थी।
       इस बार जब वो गाँव गया तो पड़ोस में रहने वाली चाची ने उसे सलाह दी कि उसे मछलियों को आटे की गोलियां खिलानी चाहिए, इससे क़िस्मत साथ देती है। वह किसी भी तरह अपनी मेहनत का हाथ क़िस्मत के हाथ में देना चाहता था, इसलिए वह शह्र मछलियों को आटे की गोलियां खिलाने के इरादे के साथ लौटा। आते ही उसने आटा ख़रीदा घर में ले जा कर गूंथा और उसकी गोलियां बना कर निकल पड़ा उस नदी की ओर जो उस शह्र के ठीक बाहर से बहती थी। वह उस नदी पर बने पुल पर खड़े हो कर आटे की गोलियां पानी फेंकने लगा। उसकी आँखें पुल के नीचे बहती नदी की ओर थीं लेकिन नज़र भविष्य में कहीं दूर। जैसे ही उसकी नज़र भविष्य से लौटी तो उसे महसूस हुआ कि पुल नदी से इतना ऊपर है कि उसे यह दिखाई ही नहीं दे रहा है कि गोलियां मछलियाँ खा भी रही हैं या नहीं। पहले से ही निराश था वह, इस बात से उसकी निराशा और बढ़ गयी और वह बची हुई गोलियों को ले कर अपने कमरे की ओर लौटने लगा। लौटते हुए उसे अपने कमरे पर में ही मछलियाँ पालने और उन्हें आटे की गोलियां खिलाने का ख़याल आया। वह इस बात से भी खुश था कि उसे किसी नदी या तालाब तक जाने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ेगा। वह तेज़ी से बढ़ चला क्यूंकि वह मछलियों को खरीदने में भी कुछ समय बचा लेना चाहता था।
वह सबसे पहले उस शह्र के प्रसिद्द मछली बाज़ार पहुंचा वहाँ हर तरफ़ मछलियां ही मछलियां थी, अधिकाँश मरी हुई। और जो ज़िंदा थीं उन्हें देख कर कहीं से ऐसा नहीं लग रहा था कि उन्हें पाला जाना चाहिए। वह बाज़ार उसे मछलियों का यातना गृह लगा।  वह तुरंत  बाज़ार से निकल गया और ढूंढते ढूँढ़ते एक दुकान ‘मत्स्य’ पर पहुंचा जहां पालने योग्य मछलियां और एक्वेरियम बेचे जा थे। वह अन्दर घुसा और मछलियों को देखने लगा। जैसे ही उसकी नज़र गोल्डफिश पर पड़ी वह मुग्ध हो गया और उसे अपलक देखने लगा। और गोल्डफिश भी चूँकि दूसरी मछलियों की तरह पलकों के बगैर पैदा हुई थी इसलिए वह लड़के को पहले से ही अपलक देख रही थी। लड़के ने फ़ैसला लिया कि वह गोल्डफिश ही लेगा। दुकानदार नें उसे उसे गोल्डफिश के रख रखाव के बारे में पूरी जानकारी दी। लड़के को यह जानकर बहुत अफ़सोस हुआ कि घर में पाली जाने मछली को आटे की गोलियां खिलाना ठीक नहीं है, बल्कि उसे विशेष किस्म का चारा खिलाना बेहतर होता है जो बाज़ार में मिलता है। उसने बड़ी निराशा से मछली को देखा और सोचा कि फिर क्या फायदा मछली को लेने का, ठीक तभी दुकानदार नें कहा ‘एंड सर..इट ब्रिंग्स यू गुड लक’। गुड लक...उसे और चाहिए भी क्या था गुड लक के सिवा, अब वो आटे की गोलियां खिला कर आये या बाज़ार से खरीदा गया चारा खिला कर।
घर आ कर उसने पढने की मेज़ पर फ़िश बाउल को रख दिया। जब वह मछली को चारा खिलाते हुए बाउल के खुले हुए मुंह से बाउल में झांकता तो उसे लगता है बाउल के अन्दर कोई छोटी-नदी है और उसकी आँखें एक पुल हैं जिस पर खड़ा हो कर वह नदी में झाँक रहा है। वह जैसे ही यह सोचता उसे शह्र बाहर बहती हुई नदी पर बना हुआ पुल याद और वह सोचता कि इस बार नहीं हुआ तो वो अपनी असफलता अपनी आस्थाओं, अपने अंधविश्वासों, अपने टोटकों और इस मछली समेत उसी नदी में कूद जाएगा।
वही नदी जो उस शह्र के बाहर बहती थी, एक गाँव के पास से हो कर गुज़रती थी। एक गाँव जिसमें थोडा मेरा गाँव था, थोडा आपका गाँव, और थोडा-थोडा सबका गाँव था। उसी गाँव में एक मछुवारा रहता था। मछुवारा अब सिर्फ मछुवारा रहा गया था। वह न पति बचा था, न बेटा। उसका एक बेटा था जो नदी में ही डूब के मर गया था। इसलिए उसमें पितृत्व का अंश भी नहीं बचा था। वह सिर्फ और सिर्फ मछुवारा था और कुछ नहीं। वह दिन भर मछली मारता और शाम को पास के क़स्बे में जा कर बेच आता था। जो पैसे मिलते थे उससे थोड़ी सी शराब पीता और थोडा खाना खाता, फिर अपनी झोपडी में आ कर सो जाता था। कई सालों से उसकी यही दिनचर्या थी। जिसमें कभी भी कोई बदलाव नहीं आया। उसकी झोपडी के बगल में एक लुहार की झोपडी थी। सुब्ह के आठ बजते ही वह वह काम पर लग जाता था। खट-खट.. झन्न-झन्न... फट-फट..घ्घर्रर्र.. कि आवाजों से ही मछुवारे की नींद खुलती थी। वह उठता और लोटा लेकर नदी की ओर जाने के लिए जब घर से निकलता तो उसे लोहार के घर के बाहर एक खटारा कार का ढांचा दिखाई देता, पता नहीं लोहार ने उसे तोड़ कर अब तक दूसरे औजारों में क्यूँ नहीं ढाला था, शायद उस कार के ढाँचे को वो स्टेटस सिम्बल की तरह रखता था। मछुवारा कार पर नज़र डालता तो उस का मन बुझ जाता वह अपने आप को उस कार के जैसा ही पाता जिस पर समय धूल की तरह जमता जा रहा है। वह उदास होता और नदी की तरफ चल देता। वह लौट कर लोटा घर रखता और अपना जाल लेकर फिर से नदी किनारे पहुँच जाता। भूख लगती तो मछली भूनता और खा लेता। भूख नहीं लगती तो सीधा रात को खाना खाता।
उसने दुसरे मछुवारों से सुन रखा था कि समुन्दर में बहुत बड़ी बड़ी मछलियां होती हैं और वो मगरमच्छों से भी अधिक ख़तरनाक होती हैं। उसे ख़याल आता कि नदी भी तो समंदर में जा के मिलती है किसी दिन कोई वैसी ही ख़तरनाक मछली उसके जाल में फंस गयी और फिर उसका जाल काट के उसको खा गयी तो क्या होगा? वह यह सोचते ही डर जाता और फिर सोचता कि अच्छा ही होगा मर जाएगा तो, जिंदा रहने में भी कौन सा बहुत मज़ा आ रहा है, कितनी नीरस है यह ज़िन्दगी, और फिर ज़िन्दगी भर उसने मछलियां मारी हैं अगर उसे कोई मछली मार देगी तो उसका पाप भी कट जाएगा। फिर पिछले ख़याल की दुम पकड़कर दूसरा ख़याल आता कि जब आज तक कोई ऐसी मछली इस नदी में नहीं आई तो अब क्या आएगी। एक रंगीन मछली तो दिखती नहीं है इसमें। वही मांगुर वही झींगा। यह सोचते ही उसके मन पर छाई हुई नीरसता बढ़ जाती। और फिर वह सोचता ही चला जाता। वही सोना, वही जागना, वही लोहार, वही खटपट, वही नदी, वही रास्ता, वही गाँव, वही त्यौहार, त्योहारों में शहरों से गाँव लौटने वाले वही लोग, वही ज़िन्दगी। एक दिन भी ऐसा नहीं जिसमें अचानक कुछ बदलाव आया हो, और उसकी नीरसता ख़त्म हुई हो। बस नीरसता..नीरसता ही नीरसता उसे चारो ओर नज़र आती।  वह यह सोच कर हैरान होता था कि गाँव के बाक़ी लोगों में यह नीरसता क्यों नहीं थी। अगर उसका परिवार होता तो क्या वह भी बाक़ी लोगों जैसा खुश होता? लेकिन जैसे ही उसे महसूस होता कि परिवार होने पर वह खुश होता तो वह उदास हो जाता।
यह नीरसता बरसों से उसके मन पर छाई थी। उसके आस पास बरसों से कुछ भी नया नहीं हो रहा था। अगर कुछ नया होता भी था तो ठाकुर की साहब के घर की सफ़ेदी जैसा कुछ जो उसके अवसाद को और बढाता ही था। हाँ गाँव में बच्चे पैदा होते थे लेकिन उसने पहले भी देखा था बच्चों को पैदा होते हुए बढ़ते हुए। गाँव में लोग मरते भी थे लेकिन किसी के मरने से क्या नीरसता में कमी आ सकती है। वैसे भी उसने तो अपनी बीवी-बच्चे तक को मरते देखा था। जन्म और मरने की ये घटनाएं तक उसकी नीरसता को दूर नहीं कर पाती थीं। अलबत्ता बढ़ा ज़रूर देती थीं। जब भी कोई जन्म लेता या मरता तो वह सोचने लगता कि वह कितना बार जन्मा होगा और किस किस रूप में ? कभी कभी खुद ही अंदाज़ा लगाता कि कम से एक आध करोड़ बार तो उसका पुनर्जन्म हुआ ही होगा। फिर वह सोचता कि फिर तो वह एक आध करोड़ बार मरा भी होगा। उफ़.. क्या चक्कर है.. वही पैदा होना वही मर जाना.. वह इतनी बार जन्म लेने और मृत्यु के बारे में सोच कर ही ऊब जाता और अपनी आत्मा पर तरस खाता कि उसे कितनी ऊबन का सामना करना पड़ता होगा। लेकिन साथ ही वह यह भी सोचता कि आत्मा को अगर बातें और ऊबन याद रहतीं तो ख़ुद उसे भी पिछले जन्म की और पिछले के पिछले जन्म की बातें याद होतीं। और जब उसे कोई पिछला जन्म नहीं याद आता तो  वह यह सोचकर निश्चिन्त हो जाता कि आत्मा की याददाश्त कमज़ोर होती है, इस कारण बार बार जन्म लेने और मरने के बावजूद वह ऊबती नहीं होगी। उसे हर बार मरना और जन्म लेना नया ही लगता होगा। 
एक बार मुछुवारा जब बहुत ऊब गया तो उसने मरने की ठान ली। ऐसा नहीं था कि उसने पहली बार मरने की ठानी थी। इसके पहले भी एक बार बहुत ऊब कर वह मरने की कोशिश करके चुका था। मरने की कोशिश के साथ साथ उसने अपने मोक्ष की भी व्यवस्था की थी। उसने सोचा था की अगर वह नदी में कूद के जान दे दे तो उसकी लाश को मछलियां खा जाएँगी और इस तरह मछलियों को मारने का उसका पाप कट जाएगा। वह एक बड़े से पुल से नदी के ठीक बीच में कूदा था उसका अंदाज़ा था कि नदी के ठीक बीच में कूदने से वह चाह कर भी नदी पार नहीं कर पायेगा। लेकिन नदी में डूबते ही जब उसे घुटन महसूस होने लगी तो वह नदी पार करने की कोशिश करने लगा। आधे रस्ते में जब वह थक के चूर होकर फिर से डूबने लगा तो उसने मदद के लिए आवाज़ लगायी। आवाज़ ने जल्द ही एक मददगार ढूंढ लिया जिसने जल्द ही मछुवारे को बचा लिया। हम जब नदी में उतारते हैं तो नदी से निकलते हुए थोड़ी सी नदी साथ हमारे साथ हो लेती है। मछुवारा पानी में भीगा हुआ घर लौटा। लोहार उसे रोज़ देखता था लेकिन दिन भर मछली मारने के बावजूद मछुवारा कभी भीगा हुआ घर नहीं लौटा था बस कुछ छींटे उसके कपड़ों पर पड़े होते थे। लोहार नें जब भीगे होने के वजह जाननी चाही तो मछुवारे नें सच-सच बता दिया कि वह ज़िन्दगी से ऊब कर आत्महत्या करने गया था। लोहार ने उसे सलाह दी की उसे मछलियों को आटे की गोलियां खिलानी चाहिए इससे उसकी क़िस्मत बदल सकती है। लोहार नें अपने दरवाज़े के बाहर पड़े कार के ढाँचे की तरफ इशारा करते हुए मछुवारे को बताया कि वह भी हर चीज़ से ऊब गया था लेकिन एक पंडित की सलाह पर उसने मछलियों को आटे की गोलियां खिलाईं और उसकी क़िस्मत ही बदल गयी। साथ ही उसने मछुवारे से पूछा कि है क्या गाँव में कोई दूसरा घर जिसके दरवाज़े पर कार हो? ढांचा ही सही। मछुवारा निरुत्तर था। लेकिन निरुत्तरता के पीछे वह सोच रहा था कि मछुवारा अगर मछली से दोस्ती कर लेगा तो मरेगा क्या, बेचेगा क्या, कमाएगा क्या और खायेगा क्या?
आत्महत्या के पिछले असफल प्रयास को मछुवारा भूला नहीं था और इस बार उसनें मरने का दृढ निश्चय किया हुआ था। उसकी दृढ़ता एक पत्थर में बदल गयी थी। उसने तय किया था कि इस बार पानी में कूदने से पहले वह अपने आप से एक पत्थर बाँध लेगा। इससे अगर पानी में घुटन भी होने लगेगी तो वह ऊपर नहीं आ पाएगा। वह पुल पर पहुंचा उसने आस पास गुज़रते हुए लोगों को गुज़र जाने दिया। इससे पहले कि कोई दूसरा आता उसने रस्सी का एक सिरा पत्थर में बांध दिया और दूसरा सिरा ख़ुद से बाँध लिया। उस समय उसके मन में एक बात आई कि रस्सी अगर किसी केबल जैसी निकली और जीवन का प्रवाह उसकी और से पत्थर में हो गया तो? ज़िंदा हो जाने के बाद उसे डूबता हुआ देख कर क्या पत्थर उसे बचाएगा? यह सोच कर कि यह मरते वक़्त आने वाले बेहूदा ख़यालों में से एक ख़याल है उसने तुरंत उस ख़याल को झटक दिया। उसने पत्थर को नदी की तरफ़ लटका दिया। फिर कूदने से पहले एक लम्बी सी सांस ली, जीवन के आख़िरी घूँट की पी और उसके बाद नदी में कूद गया। पहले नदी में पत्थर गिरा और तेज़ी से नीचे चला गया। फिर मछुवारा गिरा और तल की ओर जाने लगा। मछुवारा जैसे जैसे नीचे की और जा रहा था उसे नदी का बहाव कम होता महसूस हो रहा था। बहाव के साथ ही उसकी आख़िरी ली हुई सांस भी कम होती जा रही थी। वह सोच रहा था की अभी ये बहाव एक दम रुक जाएगा और चारो तरफ सिर्फ घुटन होगी कि ठीक तभी उसके सामने एक सोन मछली आ गयी। सोन मछली यानी गोल्ड फिश। अचानक मछुवारे के अन्दर रोमांच भर गया उसके अन्दर की बोरियत बरसों की नीरसता जैसे पानी में घुलने लगी। नदी के अनंत पानी में। और वह अपने आप को पत्थर से आज़ाद करने की कोशिश करने लगा।

-स्वप्निल तिवारी

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

सब के सब सिर्फ तेरी बात ही करना चाहें/سب کے سب صرف تری بات ہی کرنا چاہیں-ghazal

दिल, ज़बां, ज़हन मेरे आज संवरना चाहें
सब के सब सिर्फ तेरी बात ही करना चाहें

دل زباں ذھن مرے آج سنورنا چاہیں
سب کے سب صرف تری بات ہی کرنا چاہیں 

दाग़ हैं हम तेरे दामन के सो ज़िद्दी भी हैं
हम कोई रंग नहीं हैं के उतरना चाहें

داغ ہیں ہم ترے دامن کے سو ضدی بھی ہیں
ہم کوئی رنگ نہیں ہیں کے اترنا چاہیں

आरज़ू है हमें सहरा की सो हैं भी सैराब
ख़ुश्क हो जाएँ हम इक पल में जो झरना चाहें

آرزو ہے ہمیں سہرا کی سو ہیں بھی سیراب
خشک ہو جاہیں ہم اک پل میں جو جھرنا چاہیں 

ये बदन है तेरा, ये आम सा रस्ता तो नहीं
इसके हर मोड़ पे हम सदियों ठहरना चाहें

یہ بدن ہے تیرا یہ عام سا رستہ تو نہیں
اس کے ہر موڈ پے ہم صدیوں ٹھہرنا چاہیں

ये सहर है तो भला चाहिए किसको ये के हम
शब की दीवार से सर फोड़ के मरना चाहें

یہ سحر ہے تو بھلا چاہئے کیسکو یہ کہ ہم
شب کی دیوار سے سر پھوڑکے مارنا چاہیں

जैसे सोये हुए पानी में उतरता है सांप
हम भी चुपचाप तेरे दिल में उतरना चाहें

جیسے سوئے ہوئے پانی میں اترتا ہے سانپ
ہم بھی چپ چاپ ترے دل میں اترنا چاہیں 

आम से शख़्स के लगते हैं यूँ तो तेरे पाँव
सारे दरिया ही जिन्हें छू के गुज़रना चाहें

عام سے شخص کے لگتے ہیں یوں تو تیرے پانو
سارے دریا ہی جنہیں چھو کے گزرنا چاہیں 

चाहते हैं के कभी ज़िक्र हमारा वो करें
हम भी बहते हुए पानी पे ठहरना चाहें

چاہتے ہیں کہ کبھی ذکر ہمارا وو کریں
ہم بھی بہتے ہوئے پانی پے ٹھہرنا چاہیں 

नाम आया है तिरा जब से गुनहगारो  में
सब गवह अपनी गवाही से मुकरना चाहें

نام آیا ہے ترا جب سے گنہگاروں میں
سب گوہ اپنی گواہی سے مکرنا چاہیں


वस्ल औ हिज्र के दरिया में वही उतरें जो
इस तरफ डूब के उस ओर उबरना चाहें


وصل اور ہجر کے دریا میں وہی اتریں جو
اس طرف ڈوب کے اس اور ابرنا چاہیں


कोई आएगा नहीं टुकड़े हमारे चुनने
हम अपने जिस्म के अन्दर ही बिखरना चाहें

کوئی ایگا نہیں ٹکڑے ہمارے چننے
ہم اپنے جسم کے اندر ہی بکھرنا چاہیں

-swapnil

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

ہاں دھنک کے رنگ سارے کھل گئے/हाँ धनक के रंग सारे खुल गए


ہاں دھنک کے رنگ سارے کھل گئے
مجھ پے تیرے سب اشارے کھل گئے

हाँ धनक के रंग सारे खुल गए
मुझे पे तेरे सब इशारे खुल गए

ایک تو ہم کھیل میں بھی تھے نۓ
اس پے پتے بھی ہمارے کھل گئے

एक तो हम खेल में भी थे नए
उस पे पत्ते भी हमारे खुल गए

جھیل میں آنکھوں کی تم اترے ہی تھے
اور خابوں کے شکارے کھل گئے

झील में आँखों की तुम उतरे ही थे
और ख़ाबों के शिकारे खुल गए

نرم ہی تھی یاد کی ہر پنکھڑی
پھر بھی میرے زخم سارے کھل گئے

नर्म ही थी याद की हर पंखुड़ी
फिर भी मेरे ज़ख्म सारे खुल गए

مجھکو جکڑے تھے کئی بندھن مگر
تیرے بندھن کے سہارے کھل گئے

मुझको जकड़े थे कई बंधन मगर
तेरे बंधन के सहारे खुल गए
-swapnil

रविवार, 24 अगस्त 2014

wo khushbu badan thi-nazm

وو خوشبو بدن تھی
مگر خود میں سمٹی سی اک امر تک یوں ہی بیٹھی رہی
بس اک لمس کی منتظر
اسے ایک شب جیوں ہی میں نے چھوا اس سے تتلی اڑی 
پھر اک اور اک اور تتلی اڑی دیر تک تتلیاں یوں ہی اڑتی رہیں
چھنٹی تتلیاں جب کہیں بھی نہ تھی وو
تبھی سے تعقب میں ہوں تتلیوں کے
کیے جا رہا ہوں انہیں میں اکٹھا 
کہ اک روز انسے دوبارہ میں تخلیق اس کو کرونگا
جو خوشبو بدن تھا
وو خوشبو بدن تھا 

-swapnil tiwari-

वो ख़ुश्बू बदन थी
मगर ख़ुद में सिमटी सी इक उम्र तक यूँ ही बैठी रही
बस इक लम्स की मुन्तज़िर
उसे एक शब ज्यों ही मैंने छुआ, उससे तितली उड़ी,
फिर इक और इक और तितली उडी, देर तक तितलियाँ यूँ ही उडती रहीं
छंटी तितलियाँ जब कहीं भी न थी वो
तभी से तअक़्क़ुब में हूँ तितलियों के
इकठ्ठा किये जा रहा हूँ इन्हें मैं
के इक रोज़ इनसे दुबारा मैं तख़्लीक़ उसको करूँगा
जो ख़ुश्बू बदन थी
वो ख़ुश्बू बदन थी….

-swapnil tiwari-

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

jee men aata hai jaga den tumko-ghazal

छुप के किरनों में सदा दें तुमको
जी में आता है जगा दें तुमको

چھپ کے کرنوں میں سدا دیں تم کو 
جی میں آتا ہے جگا دیں تم کو 

मेरे साहिल पे न लिक्खी जाओ
मेरी लहरें न मिटा दें तुमको

میرے ساحل پے نہ لکھی جاؤ 
میری لہریں نہ مٹا دیں تم کو

रोज़ इक शाम का है ख़र्च इन पर
ख़ाली कर दें न ये यादें तुमको

روز اک شام کا ہے خرچ ان پر
خالی کر دیں ن یہ یادیں تم کو

वस्ल की शब में कहा था उसने
आओ इक ख़ाब जुदा दें तुमको

وصل کی شب میں کہا تھا اسنے
آؤ اک خواب جدا دیں تمکو

नींद के बाग़ में आओ इक दिन
अपने कुछ ख़ाब चखा दें तुमको

نیند کے باغ میں آؤ اک دن
اپنے کچھ خواب چکھا دیں تم کو

दिल के आँगन में किसी दिन यादें
शोर की तरह मचा दें तुमको

دل کے آنگن میں کسی دن یادیں
شور کی طرح مچا دیں تمکو

? ज़िन्दगी ! ख़त्म करें ये रिश्ता
? अबके बिछड़ें तो भुला दें तुमको

زندگی! ختم کریں یہ رشتہ؟
اب کے بچھڑیں تو بھلا دیں تم کو ؟

तुम जहां रक्खो सितारे अपने
हम वो छोटा सा ख़ला दें तुमको

تم جہاں رکھو ستارے اپنے
ہم وو چھوٹا سا خلا دیں تم کو

शहरे-दिल में तो नये हो ग़म तुम
आओ ये शह्र घुमा दें तुमको

شہرے دل میں تو نۓ ہو غم تم
آؤ یہ شہر گھما دیں تم کو

'आग तुम ही से है लगनी ‘आतिश
यार कैसे न हवा दें तुमको

آگ تم ہی سے ہے لگنی 'آتش'
یار کیسے نہ ہوا دیں تمکو

-swapnil tiwari 'aatish'

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

Gayab kamra -nazm

घर के जिस कमरे में जाऊं
इक कमरा, जो ग़ायब है
हर कमरे में साथ मिरे
आ जाता है
....जैसे मेरा साया हो
माज़ी का वो ग़ायब कमरा
बंद ही रहता है अक्सर
जैसे उसको खोलने वाली
उसके ताले के कानों में
‘खुल जा सिम सिम’ कहने वाली
चाभी खो बैठा हूँ कहीं पर..
लेकिन अपने आप कभी उसका दरवाज़ा
मुझको खुला मिलता है तो
मैं उसके अन्दर बैठा घंटों रोता हूँ,
और इक आदमक़द आईने पर जो धूल पड़ी मिलती है
उस पर नाम तिरा लिखता हूँ

گھر کے جس کمرے میں جاوں 
اک کمرہ، جو غایب ہے
ہر کمرے میں ساتھ میرے آ جاتا ہے
جیسے میرا سایہ ہو.......
ماضی کا وو غایب کمرہ 
بند ہی رہتا ہے اکثر
جیسے اسکو کھولنے والی
اسکے تالے کے کانوں میں 
'کھل جا سمسم کہنے والی
چابھی کھو بیٹھا ہوں کہیں پر
لیکن اپنے آپ کبھی 
اسکا دروازہ مجھکو کھلا ملتا ہے تو
گھنٹوں میں اسکے اندر بیٹھا روتا ہوں
اور اک آدامقد آئینے پر جو دھول پدی ملتی ہے
اس پر نام تیرا لکھتا ہوں