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wo khushbu badan thi-nazm

وو خوشبو بدن تھی
مگر خود میں سمٹی سی اک امر تک یوں ہی بیٹھی رہی
بس اک لمس کی منتظر
اسے ایک شب جیوں ہی میں نے چھوا اس سے تتلی اڑی 
پھر اک اور اک اور تتلی اڑی دیر تک تتلیاں یوں ہی اڑتی رہیں
چھنٹی تتلیاں جب کہیں بھی نہ تھی وو
تبھی سے تعقب میں ہوں تتلیوں کے
کیے جا رہا ہوں انہیں میں اکٹھا 
کہ اک روز انسے دوبارہ میں تخلیق اس کو کرونگا
جو خوشبو بدن تھا
وو خوشبو بدن تھا 

-swapnil tiwari-

वो ख़ुश्बू बदन थी
मगर ख़ुद में सिमटी सी इक उम्र तक यूँ ही बैठी रही
बस इक लम्स की मुन्तज़िर
उसे एक शब ज्यों ही मैंने छुआ, उससे तितली उड़ी,
फिर इक और इक और तितली उडी, देर तक तितलियाँ यूँ ही उडती रहीं
छंटी तितलियाँ जब कहीं भी न थी वो
तभी से तअक़्क़ुब में हूँ तितलियों के
इकठ्ठा किये जा रहा हूँ इन्हें मैं
के इक रोज़ इनसे दुबारा मैं तख़्लीक़ उसको करूँगा
जो ख़ुश्बू बदन थी
वो ख़ुश्बू बदन थी….

-swapnil tiwari-

टिप्पणियाँ

Fursatnama ने कहा…
वो ख़ुश्बू बदन थी....
iss nazm ko jitni baar padhoon iski khushbuu utni baar kahin andar tak mehka jaati hai...

Kya khoobsurat cheez likh daali hai aapne!
lori ने कहा…
rabba!!!
sakit hu, jawab nahi apki nazm ka
कितनी बार कहा जाए... शुक्रिया... :)
shukriya lori ali sahiba nazm aapko pasand aayi... :)

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