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दबी है कोई दुखती रग खुदाया/ دبی ہے کوئی دکھتی رگ خدایا

दबी है कोई दुखती रग खुदाया ज़मीं ने आसमां सर पर उठाया دبی ہے کوئی دکھتی رگ خدایا زمیں نے آسماں سر پر اٹھایا वो चलता जा रहा था दूर मुझसे घना कुहरा था चारो सिम्त छाया وہ چلتا جا رہا تھا دور مجھ سے گھانا کوہرا تھا چاروں سمت چھایا ये किस की याद-सी है दिल में मेरे ये वीरानों को है किसने सजाया یہ کس کی یاد سی ہے دل میں میرے یہ ویرانوں کو کسنے ہے سجایا अकेला था मैं उस नाटक में शायद कि हर किरदार मैंने ही निभाया اکیلا تھا میں اس ناٹک میں شاید کہ ہر کردار میں نے ہی نبھایا ये दुनिया आ गयी सकते में सारी लतीफ़ा ज़िंदगी नें जब सुनाया یہ دنیا آ گئی سکتے میں ساری لطیفہ زندگی نے جب سنایا न हो फिर जागने में देर मुझको इसी इक बात नें शब भर जगाया نہ ہو پھر جاگنے میں دیر مجھ کو اسی اک بات نے شب بھر جگایا तुम्हारे एक दिन को जज़्ब करके ये ‘ आतिश ’ ज़िंदगी भर जगमगाया تمھارے ایک دن کو جذب کر کے یہ آتش زندگی بھر جگمگایا 

مسافر! تری تاک میں ہیں دھندھلکے/मुसाफ़िर ! तिरी ताक में हैं धुंधलके - ग़ज़ल

कहीं खो न जाना ज़रा दूर चल के मुसाफ़िर ! तिरी ताक में हैं धुंधलके मिरा नींद से आज झगडा हुआ है सो लेटे हैं दोनों ही करवट बदल के इसी डर से चलता है साहिल किनारे कहीं गिर न जाये नदी में फिसल के अजब बोझ पलकों पे दिन भर रहा है अगरचे तिरे खाब थे हलके हलके जताते रहे हम, सफ़र में हैं लेकिन भटकते रहे अपने घर से निकल के अँधेरे में मुबहम* हुआ हर नज़ारा मिली एक दूजे में हर शय पिघल के ज़माने से सारे शरर चुन ले ‘आतिश’ यही तो अनासिर* हैं तेरी ग़ज़ल के मुबहम- अस्पष्ट अनासिर - तत्व کہیں کھو نہ جانا ذرا دور چل کے  مسافر! تری تاک میں ہیں دھندھلکے  مرا نیند سے آج جھگڑا ہوا ہے  سو لیٹے ہیں دونو ہی  کروٹ  بدل کے اسی ڈر سے چلتا ہے ساحل کنارے  کہیں گر ن جائے ندی میں پھسل کے عجب بوجھ پلکوں پے دن بھر رہا ہے  اگرچہ ترے خواب تھے ہلکے ہلکے  جتاتے رہے ہم سفر میں ہیں لیکن  بھٹکتے رہے اپنے گھر سے نکل کے  زمانے سے سارے شرر چن لے 'آتش' یہی تو عناصر ہیں  تیری غزل کے    --  Regards Swapnil...

हमेशा ही मुझको रही हड़बड़ी/ ہمیشہ ہی مجھ کو رہی ہڑبڑی-ghazal

हमेशा ही मुझको रही हड़बड़ी कहीं पर्स छूटा कहीं पर घडी कभी वक़्त भी बाँध पाऊँ यूँ ही कलाई पे बाँधी है जैसे घड़ी तिरी याद के एक झोंके से फिर मिरी नींद आँखों कि छत से उड़ी कि दरिया समंदर का क़ैदी हुआ   रवानी ही इसकी बनी हथकड़ी दिसंबर के जैसा तिरा हिज्र है   हुए छोटे दिन और रातें बड़ी   सहारा फक़त अपने साये का था   सही धूप हमने कड़ी से कड़ी टहलता रहा दिल के कमरे दुःख बजाते हुए अपनी बूढी छड़ी   अगर तुझमें   ' आतिश '  कोई आग है जला कर दिखा दे कोई फुलझड़ी ہمیشہ ہی مجھ کو رہی ہڑبڑی  کہیں پرس چھوٹا کہیں پر گھڑی  تری یاد کے ایک جھونکے سے پھر  مری نیند آنکھوں کی چھت سے اڑی  کبھی وقت بھی باںدھ پاؤں یوں ہی  کلائی پے باندھی ہے جیسے گھڑی  کہ دریا سمندر کا قیدی ہوا  روانی ہی اس کی بنی ہتھکڑی  دسمبر کے جیسا ترا ہجر ہے  ہوئے چھوٹے دن اور راتیں بڑی  ٹہلتا رہا اپنے کمرے میں دکھ  بجاتے ہوئے اپنے بوڑھی چھڑی  سہارا فقط اپنے سایے ک...

मेरे होटों को छुआ चाहती है

मेरे होटों को छुआ चाहती है ख़ामुशी! तू भी ये क्या चाहती है ? मेरे रस्ते से हटा चाहती है दिल की दीवार गिरा चाहती है मेरे कमरे में नहीं है जो कहीं अब वो खिड़की भी खुला चाहती है ज़िन्दगी! गर न उधेड़ेगी मुझे किसलिए मेरा सिरा चाहती है सारे हंगामे हैं परदे पर अब फ़िल्म भी ख़त्म हुआ चाहती है कब से बैठी है उदासी पे मिरी याद की तितली उड़ा चाहती है नूर मिट्टी में ही होगा उनकी ‘जिन चरागों को हवा चाहती है’ मेरे अन्दर है उमस इस दरजा मुझमें बारिश-सी हुआ चाहती है भोर आई है इरेज़र की तरह शब की तहरीर मिटा चाहती है आसमां में हैं सराबों-सी वो जिन घटाओं को हवा चाहती है चाँद का फूल है खिलने को फिर शाम अब शब को छुआ चाहती है फिर न लौटेगी मिरी आँखों में नींद रंगों-सी उड़ा चाहती है सारी दुनिया ही पिघल के ‘आतिश’ मेरे पैकर में ढला चाहती है

عجب نقشہ ہے دیکھو میرے گھر کا/अजब नक़्शा है देखो मेरे घर का- ग़ज़ल

अजब नक़्शा है देखो मेरे घर का हर इक खिड़की पे मंज़र है सहर का मिरे हालात बेहतर हो चले हैं भरोसा कर लिया था इस ख़बर का मिरे सामान में शामिल है मिट्टी इरादा है समन्दर के सफ़र का खड़ी थी वादियों में एक लडकी पहन कर कोट इक यादों के फ़र का पहाड़ों से समंदर तक खिंचा है ये दरिया है कोई टुकड़ा रबर का परिंदा शाख़ पे माज़ी के बैठा किसी की याद है कोटर शजर का बहारो! चादरें ले आओ इनकी बदन उघडा हुआ है हर शजर का कोई जिग्सा पज़ल है दुनिया सारी मैं इक टुकड़ा हूँ, पर जाने किधर का हरी क़ालीन सी इक लॉन में थी और उसपे फूल था इक गुलमोहर का बुझी आख़िर में सारी आग ‘आतिश’ भले ही दोष था बस इक शरर का عجب نقشہ ہے دیکھو میرے گھر کا  ہر اک کھڑکی پے  منظر ہے سحر کا  مرے سامان میں شامل ہے مٹی  ارادہ ہے سمندر کے سفر کا  مرے حالات بہتر ہو چلے ہیں  بھروسہ کر لیا تھا اس خبر کا کھڑی تھی وادیوں میں ایک لڑکی  پہن کر کوٹ اک یادوں کے فر کا  پہاڑوں سے سمندر تک  کھنچا ہے  یہ دریا ہے کوئی ٹکڑا ربر کا ...

लफ्ज़ मुशायरा

लफ्ज़ का यह मुशायरा पिछले साल जाड़ों में हुआ था... इधर फिर से ब्लॉग पर सक्रिय  हुआ तो सोचा आप लोगों से शेयर किया जाय... 

एक ही ग़म तेरे जाने का रहा

एक ही ग़म तेरे जाने का रहा एक दिन वो भी मगर जाता रहा आज माँ का जी बहुत अच्छा रहा आज दिन भर रेडियो बजता रहा ख़ाब में खुलती रही खिड़की कोई और उस खिड़की में वो आता रहा लॉन में आया मुझे तेरा खयाल मैं वहीं फिर देर तक बैठा रहा  जह्न के कमरे में तेरा इक खयाल रात भर जलता रहा बुझता रहा  आख़िरश पीला ही पड़ना था अगर दिल का कागज़ बेसबब सादा रहा  एक नन्हा ख़ाब मेरी नींद में पाँव उचकाकर तुझे छूता रहा  इक उचटती सी नज़र उसकी लगी और मैं बिखरा तो फिर बिखरा रहा

याद तुम्हारी शक्कर निकली

धूप के भीतर छुप कर निकली तारीकी* सायों भर निकली रात गिरी थी इक गड्ढे में शाम का हाथ पकड़कर निकली रोया..उससे मिलकर रोया चाहत भेस बदल कर निकली फूल तो फूलों सा होना था तितली कैसी पत्थर निकली सूत हैं घर के हर कोने में मकड़ी पूरी बुनकर निकली ताजादम होने को उदासी लेकर ग़म का शॉवर निकली ग़म के कितने चींटे आये याद तुम्हारी शक्कर निकली हिज्र की शब से घबराते थे यार यही शब बेहतर निकली जब भी चोर मिरे घर आये एक हंसी ही ज़ेवर निकली ‘आतिश’ कुंदन रूह मिली है उम्र की आग में जलकर निकली *तारीकी - अँधेरा 

हँस के बीमार कर दिया देखो

हँस के बीमार कर दिया देखो, तुमने अच्छी भली उदासी को  बाद मुद्दत चमन में आया हूँ, मेरे फूलों, बताओ कैसे हो ? कैसे कैसे हसीन मंज़र थे, आखिरश हिज्र खा गया सबको। घर के झगडे न लांघ पाए इसे घर की दीवार इतनी ऊँची हो रौशनाई न दिल की सूखे अब इस सुनहरे कलम से कुछ लिक्खो रास्ता कच्ची नींद जैसा है ख़ाब की तरह चुपके चुपके चलो क्यूँ हो आवारगी में कोई पड़ाव इस समंदर में क्यूँ जज़ीरा हो हुक्म देती हुई वो आँखे, उफ़! उनका सारा कहा, हुआ मानो दर्द की आँच दिल में है “आतिश”, साँस जलने लगी है कम कर दो

क्या बताएं ग़म के मौसम की तुम्हें

क्या बताएं ग़म के मौसम की तुम्हें बारहा रहती है इक जल्दी तुम्हें तुम कहाँ के फूल हो जो रोज़ ही पूछती रहती है इक तितली तुम्हें याद आते हैं मुझे ताने सभी याद आती है मेरी झिड़की तुम्हें? भेज दो यादों में अपनी खुशबुएँ मिल गयी होगी मेरी अर्ज़ी तुम्हें नम हुई होगी मेरी यादों की राख इसलिए बारिश लगी सौंधी तुम्हें झांकती रहती थी इस खिड़की से तुम ढूंढती रहती है अब खिड़की तुम्हें दिल के सहरा में बहा करती थी जो याद कुछ आती है वो नद्दी तुम्हें? आज ‘आतिश’ दूर क्यूँ बैठे हो तुम? आग लगती थी बहुत अच्छी तुम्हें