गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

याद तुम्हारी शक्कर निकली


धूप के भीतर छुप कर निकली
तारीकी* सायों भर निकली

रात गिरी थी इक गड्ढे में
शाम का हाथ पकड़कर निकली

रोया..उससे मिलकर रोया
चाहत भेस बदल कर निकली

फूल तो फूलों सा होना था
तितली कैसी पत्थर निकली

सूत हैं घर के हर कोने में
मकड़ी पूरी बुनकर निकली

ताजादम होने को उदासी
लेकर ग़म का शॉवर निकली

ग़म के कितने चींटे आये
याद तुम्हारी शक्कर निकली

हिज्र की शब से घबराते थे
यार यही शब बेहतर निकली

जब भी चोर मिरे घर आये
एक हंसी ही ज़ेवर निकली

‘आतिश’ कुंदन रूह मिली है
उम्र की आग में जलकर निकली

*तारीकी - अँधेरा 

6 टिप्‍पणियां:

Majaal ने कहा…

काफी दिनों के बाद लिखा पर,
शायरी कलम से जम कर निकली :)

बहुत अच्छे … लिखते रहिये ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुंदर ....

अर्शिया अली ने कहा…

बहुत सुंदर। बधाई।
............
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सदा ने कहा…

ताजादम होने को उदासी
लेकर ग़म का शॉवर निकली

ग़म के कितने चींटे आये
याद तुम्हारी शक्कर निकली
वाह ........ बेहतरीन

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल

Parul kanani ने कहा…

kya baat hai :)