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हँस के बीमार कर दिया देखो

हँस के बीमार कर दिया देखो, तुमने अच्छी भली उदासी को  बाद मुद्दत चमन में आया हूँ, मेरे फूलों, बताओ कैसे हो ? कैसे कैसे हसीन मंज़र थे, आखिरश हिज्र खा गया सबको। घर के झगडे न लांघ पाए इसे घर की दीवार इतनी ऊँची हो रौशनाई न दिल की सूखे अब इस सुनहरे कलम से कुछ लिक्खो रास्ता कच्ची नींद जैसा है ख़ाब की तरह चुपके चुपके चलो क्यूँ हो आवारगी में कोई पड़ाव इस समंदर में क्यूँ जज़ीरा हो हुक्म देती हुई वो आँखे, उफ़! उनका सारा कहा, हुआ मानो दर्द की आँच दिल में है “आतिश”, साँस जलने लगी है कम कर दो

क्या बताएं ग़म के मौसम की तुम्हें

क्या बताएं ग़म के मौसम की तुम्हें बारहा रहती है इक जल्दी तुम्हें तुम कहाँ के फूल हो जो रोज़ ही पूछती रहती है इक तितली तुम्हें याद आते हैं मुझे ताने सभी याद आती है मेरी झिड़की तुम्हें? भेज दो यादों में अपनी खुशबुएँ मिल गयी होगी मेरी अर्ज़ी तुम्हें नम हुई होगी मेरी यादों की राख इसलिए बारिश लगी सौंधी तुम्हें झांकती रहती थी इस खिड़की से तुम ढूंढती रहती है अब खिड़की तुम्हें दिल के सहरा में बहा करती थी जो याद कुछ आती है वो नद्दी तुम्हें? आज ‘आतिश’ दूर क्यूँ बैठे हो तुम? आग लगती थी बहुत अच्छी तुम्हें

तेरी आहट की धूप आती नहीं है

मेरे घर में न होगी रौशनी क्या नहीं आओगे इस जानिब कभी क्या? उदासी एक तो तुहफ़ा है उसका मसल देगा समय ये पंखुड़ी क्या? चहकती बोलती आँखों में चुप्पी इन्हें चुभने लगी मेरी कमी क्या ? ख़ुद उसका रंग पीछा कर रहे हैं कहीं देखी है ऐसी सादगी क्या? मुकम्मल चाहिए हर चीज़ हमको वग़रना रौशनी क्या तीरगी क्या लिपटती हैं मेरे पैरों से लहरें मुझे पहचानती है ये नदी क्या मैं इस शब से तो उकताया हुआ हूँ सहर दे पाएगी कुछ ताजगी क्या ? फक़त इक दस्तख़त से तोड़ डाला? वो रिश्ता क़ुदरतन था कागज़ी क्या..! तेरी आहट की धूप आती नहीं है समा’अत* भी मेरी कुम्हला गयी क्या ख़मोशी बर्फ सी ‘आतिश’ जमीं थी नज़र की आंच से वो गल गयी क्या? समा’अत-सुनने की शक्ति

परिकथा में प्रकाशित एक कहानी - कोलाज

दर्शन ऑफिस से निकलने ही वाला था कि उसे रात में पढ़ा हुआ निदा फाजली का शेर याद आया, जिसे उसने अपना फेसबुक स्टेटस बना लिया । ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी/ जिसको भी देखना हो कई बार देखना।’ यही था वो शेर। उसने बस स्टेटस लगाया ही था और चाहता था कि बस दो चार टिप्पणियाँ तुरंत आ जाएँ। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उसने सोचा कि अब तो घर पहुँच कर ही एक साथ सारी टिप्पणियाँ पढ़ी जायेंगी। शाम हो चुकी थी और दर्शन को जल्दी से जल्दी घर पहुंचना था । इसलिए नहीं कि घर पे उसका कोई इंतज़ार कर रहा था बल्कि इसलिए कि घर घर होता है और वहाँ आदमी को शाम को जाना ही चाहिए अन्यथा जीवन में आवारगी की सम्भावना बढ़ जाती है । और दर्शन के जीवन दर्शन में आवारगी के लिए कोई स्थान नहीं था । घर तक जाने के लिए उसे कई पापड़ बेलने पड़ते थे । पहले उसे एक मेट्रो स्टेशन आना पड़ता था , पहली मेट्रो पकडनी पड़ती थी , फिर दूसरी मेट्रो और उसके बाद ऑटो से वो घर पहुँचता था । पिछले कई महीने वो बेरोज़गार हो कर घर बैठा था , जिस वजह से उसका पेट निकल आया था । इसलिए उसने निश्चय किया था कि ऑफिस आते-जाते हुए , ऑफिस से मेट्रो स्टेशन की 15-20...