सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!
हँस के बीमार कर दिया देखो, तुम ने अच्छी भली उदासी को -स्वप्निल तिवारी
हँस के बीमार कर दिया देखो, तुम ने अच्छी भली उदासी को -स्वप्निल तिवारी
टिप्पणियाँ
इन्हें चुभने लगी मेरी कमी क्या"
खुबसूरत ग़ज़ल...
कुँवर जी,
बहुत खूबसूरत गजल ... बहुत दिनों बाद तुम्हारा लिखा पढ़ा है ॥
इन्हें चुभने लगी मेरी कमी क्या ?
गज़ब गज़ब.
कहीं देखी है ऐसी सादगी क्या?
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बेहतरीन गज़ल!!
सुनो संवेदना के स्वर भी मेरे,
नहीं तो आँच आतिश और नमी क्या?
कहीं देखी है ऐसी सादगी क्या?
मुकम्मल चाहिए हर चीज़ हमको
वग़रना रौशनी क्या तीरगी क्या
सुभान अल्लाह...एक एक शेर तराशा हुआ नगीना है...दाद कबूलें
नीरज
फक़त इक दस्तख़त से तोड़ डाला?
वो रिश्ता क़ुदरतन था कागज़ी क्या..!
ये शेर और इसमे ’कुदतरन’ का इस्तेमाल इसे और खास बना देता है..जो रिश्ते कुदरत के हाथों से ढले होते उनके सांचे मे बदलाव की गुंजाइश कितनी मुश्किल होती है..