सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!
हँस के बीमार कर दिया देखो, तुम ने अच्छी भली उदासी को -स्वप्निल तिवारी
हँस के बीमार कर दिया देखो, तुम ने अच्छी भली उदासी को -स्वप्निल तिवारी
टिप्पणियाँ
याद आते हैं मुझे ताने सभी
याद आती है मेरी झिड़की तुम्हें... वाह
ढूंढती रहती है अब खिड़की तुम्हें ...
गज़ब का ख्याल बुना है आपने ... हर वो चीज़ तलाशती है ... पूरी गज़ल एहसास लिए ...
मिल गयी होगी मेरी अर्ज़ी तुम्हें
नम हुई होगी मेरी यादों की राख
इसलिए बारिश लगी सौंधी तुम्हें
बहुत सुंदर ....
इस गज़ल की रूमानियत और सादाबयानी का मज़ा गायकी में है..!! दिल्ली की इस गरमी में यह गज़ल सोंधी सोंधी खुशबू और सर्द हवा के झोंके की तरह है!!
ढूंढती रहती है अब खिड़की तुम्हें
बेचारी खिडकी:( ये ब्लॉग की खिडकी भी तुम्हें ढूंढ रही थी.
बहुत सुन्दर गज़ल.
इसलिए बारिश लगी सौंधी तुम्हें
लिखने का बहुत ही सुन्दर अंदाज,