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तेरी आहट की धूप आती नहीं है


मेरे घर में न होगी रौशनी क्या
नहीं आओगे इस जानिब कभी क्या?

उदासी एक तो तुहफ़ा है उसका
मसल देगा समय ये पंखुड़ी क्या?

चहकती बोलती आँखों में चुप्पी
इन्हें चुभने लगी मेरी कमी क्या ?

ख़ुद उसका रंग पीछा कर रहे हैं
कहीं देखी है ऐसी सादगी क्या?

मुकम्मल चाहिए हर चीज़ हमको
वग़रना रौशनी क्या तीरगी क्या

लिपटती हैं मेरे पैरों से लहरें
मुझे पहचानती है ये नदी क्या

मैं इस शब से तो उकताया हुआ हूँ
सहर दे पाएगी कुछ ताजगी क्या ?

फक़त इक दस्तख़त से तोड़ डाला?
वो रिश्ता क़ुदरतन था कागज़ी क्या..!

तेरी आहट की धूप आती नहीं है
समा’अत* भी मेरी कुम्हला गयी क्या

ख़मोशी बर्फ सी ‘आतिश’ जमीं थी
नज़र की आंच से वो गल गयी क्या?


समा’अत-सुनने की शक्ति

टिप्पणियाँ

Lambe Samay ke baad kuch likha hai apne ... Lajawab likha hai ... Har sher naye andaaz ka ...
kunwarji's ने कहा…
"चहकती बोलती आँखों में चुप्पी
इन्हें चुभने लगी मेरी कमी क्या"

खुबसूरत ग़ज़ल...

कुँवर जी,
मुंबई में धूप की कमी है क्या ? :):)

बहुत खूबसूरत गजल ... बहुत दिनों बाद तुम्हारा लिखा पढ़ा है ॥
shikha varshney ने कहा…
चहकती बोलती आँखों में चुप्पी
इन्हें चुभने लगी मेरी कमी क्या ?
गज़ब गज़ब.
समय चक्र ने कहा…
बढ़िया भावप्रधान ...
ख़ुद उसका रंग पीछा कर रहे हैं
कहीं देखी है ऐसी सादगी क्या?
/
बेहतरीन गज़ल!!
सुनो संवेदना के स्वर भी मेरे,
नहीं तो आँच आतिश और नमी क्या?
ख़ुद उसका रंग पीछा कर रहे हैं
कहीं देखी है ऐसी सादगी क्या?

मुकम्मल चाहिए हर चीज़ हमको
वग़रना रौशनी क्या तीरगी क्या

सुभान अल्लाह...एक एक शेर तराशा हुआ नगीना है...दाद कबूलें

नीरज
अपूर्व ने कहा…
बड़े वक्त के बाद पढ़ने को मिला..सारी गज़ल ही बेहतरीन है.पर खासकर
फक़त इक दस्तख़त से तोड़ डाला?
वो रिश्ता क़ुदरतन था कागज़ी क्या..!

ये शेर और इसमे ’कुदतरन’ का इस्तेमाल इसे और खास बना देता है..जो रिश्ते कुदरत के हाथों से ढले होते उनके सांचे मे बदलाव की गुंजाइश कितनी मुश्किल होती है..
yogesh dhyani ने कहा…
badhiya gazal swapnil.

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