सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

jee men aata hai jaga den tumko-ghazal

छुप के किरनों में सदा दें तुमको
जी में आता है जगा दें तुमको

چھپ کے کرنوں میں سدا دیں تم کو 
جی میں آتا ہے جگا دیں تم کو 

मेरे साहिल पे न लिक्खी जाओ
मेरी लहरें न मिटा दें तुमको

میرے ساحل پے نہ لکھی جاؤ 
میری لہریں نہ مٹا دیں تم کو

रोज़ इक शाम का है ख़र्च इन पर
ख़ाली कर दें न ये यादें तुमको

روز اک شام کا ہے خرچ ان پر
خالی کر دیں ن یہ یادیں تم کو

वस्ल की शब में कहा था उसने
आओ इक ख़ाब जुदा दें तुमको

وصل کی شب میں کہا تھا اسنے
آؤ اک خواب جدا دیں تمکو

नींद के बाग़ में आओ इक दिन
अपने कुछ ख़ाब चखा दें तुमको

نیند کے باغ میں آؤ اک دن
اپنے کچھ خواب چکھا دیں تم کو

दिल के आँगन में किसी दिन यादें
शोर की तरह मचा दें तुमको

دل کے آنگن میں کسی دن یادیں
شور کی طرح مچا دیں تمکو

? ज़िन्दगी ! ख़त्म करें ये रिश्ता
? अबके बिछड़ें तो भुला दें तुमको

زندگی! ختم کریں یہ رشتہ؟
اب کے بچھڑیں تو بھلا دیں تم کو ؟

तुम जहां रक्खो सितारे अपने
हम वो छोटा सा ख़ला दें तुमको

تم جہاں رکھو ستارے اپنے
ہم وو چھوٹا سا خلا دیں تم کو

शहरे-दिल में तो नये हो ग़म तुम
आओ ये शह्र घुमा दें तुमको

شہرے دل میں تو نۓ ہو غم تم
آؤ یہ شہر گھما دیں تم کو

'आग तुम ही से है लगनी ‘आतिश
यार कैसे न हवा दें तुमको

آگ تم ہی سے ہے لگنی 'آتش'
یار کیسے نہ ہوا دیں تمکو

-swapnil tiwari 'aatish'

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

Earth hour (नज़्म/نظم)

मेरी ख़ाहिश है हर महीने में रात इक इस तरह की हो जिसमें शह्र की सारी बत्तियां इक साथ एक घंटे को चुप करा दी जाएँ शह्र के लोग छत पे भेजे जाएँ और तारों से जब नज़र उलझे तब अँधेरे का हुस्न उन पे खुले कहकशाँ टूट कर गिरे सब पे सब की आँखों के ज़ख्म भर जाएँ …. मुझ को गर इंतेख़ाब करना हो मैं अमावास की रात को चुन लूँ चाँद की ग़ैरहाज़िरी में ये बात साफ़ शायद ज़ियादा हो हम पे ‘ अपना नुक़सान कर लिया है बहुत हमने ईजाद रौशनी कर के ’` میری خواہش ہے ہر مہینے میں رات اک اس طرح کی ہو جس میں شہر کی ساری بتیاں اک ساتھ ایک گھنٹے کو چپ کرا دی جایں شہر کے لوگ چھت پے بھیجے جایں ان کی تاروں سے جب نظر الجھے تب اندھیرے کا حسن ان پے کھلے کہکشاں ٹوٹ کر گری ان پر انکی آنکھوں کے زخم بھر جائیں مجھ کو گر انتخاب کرنا ہو میں اماوس کی رات کو چن لوں چاند کی غیر حاضری میں یہ بات صاف شاید زیادہ ہو ہم پر اپنا نقصان کر لیا ہے بہت ہم نے ایجاد روشنی کر کے -Swapnil-