सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मैं धीमा राग हूं भाता है ये उतार मुझे/میں دھیما راگ ہوں بھاتا ہے یہ اتار مجھے

मैं धीमा राग हूं भाता है ये उतार मुझे
सदा की ओट में ख़ामुशी पुकार मुझे

घुमाता है जो लड़कपन का रेगज़ार मुझे
उठाये फिरता है काँधे पे इक ग़ुबार मुझे

तैरना ही बने और डूब ही पाऊं
हर एक मौज किये जाय दरकिनार मुझे

कुछ ऐसा दर्द है जी चाहता है तेरी याद
वो धुन बजाये करे अब जो तार तार मुझे

नहीं है दूसरी गाड़ी कोई भी तेरे बाद
यूँ बीच नींद में ख़्वाब मत उतार मुझे

ज़रा ख़याल भर आता है एक शै का और
दबोच लेते हैं फिर उस के इश्तेहार मुझे


میں دھیما راگ ہوں بھاتا ہے یہ اتار مجھے
صدا کی اوٹ میں آ خامشی پکار مجھے 

گھماتا ہے جو لڈکپن کا ریگزار مجھے
اٹھائے پھرتا ہے کاندھے پہ اک غبار مجھے

نہ تیرنا ہی بنے اور نہ ڈوب ہی پاؤں
ہر ایک موج کئے جائے درکنار مجھے

کچھ ایسا درد ہے جی چاہتا ہے تیری یاد
وہ دھن بجائے کرے اب جو تار تار مجھے

نہیں ہے دوسری گاڑی کوئی بھی تیرے بعد
یوں بیچ نیند میں اے خواب مت اتار مجھے

ذرا خیال بھر آتا ہے ایک شے کا اور
دبوچ لیتے ہیں پھر اس کے اشتہار مجھے

-Swapnil Tiwari-


टिप्पणियाँ

नहीं है दूसरी गाड़ी कोई भी तेरे बाद
यूँ बीच नींद में ऐ ख़्वाब मत उतार मुझे!
.
चूमने लायक शे'र!! बहुत ही प्यारी गज़ल!

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भोर

सूरज नयी सुबह की दहलीज़ पे खड़ा है और एक नज़्म मेरी दहलीज़ पे, तुम आओ कुण्डी खोलो दोनों तरफ उजाला हो...!

अपनी जिद हूँ, आप अड़ा हूँ

जाने क्यूं इस ज़िद पे अड़ा हूँ अपने मुक़ाबिल आप खड़ा हूँ चाँद रहा हूँ माँ की खातिर यानी बनने में बिगड़ा हूँ मैं अपने मन के कमरे में जाने क्यूं बेहोश पड़ा हूँ मैं ही भीष्म हूँ, मैं ही अर्जुन मैं ही बन कर तीर गड़ा हूँ दूर तलक उखड़ी है मिट्टी मैं जब भी जड़ से उखड़ा हूँ दिल में वो उतना ही आये शहरों से जितना झगड़ा हूँ “आतिश” मन की आंच बढ़ा लूं? तुम कहते हो कच्चा घड़ा हूँ

Earth hour (नज़्म/نظم)

मेरी ख़ाहिश है हर महीने में रात इक इस तरह की हो जिसमें शह्र की सारी बत्तियां इक साथ एक घंटे को चुप करा दी जाएँ शह्र के लोग छत पे भेजे जाएँ और तारों से जब नज़र उलझे तब अँधेरे का हुस्न उन पे खुले कहकशाँ टूट कर गिरे सब पे सब की आँखों के ज़ख्म भर जाएँ …. मुझ को गर इंतेख़ाब करना हो मैं अमावास की रात को चुन लूँ चाँद की ग़ैरहाज़िरी में ये बात साफ़ शायद ज़ियादा हो हम पे ‘ अपना नुक़सान कर लिया है बहुत हमने ईजाद रौशनी कर के ’` میری خواہش ہے ہر مہینے میں رات اک اس طرح کی ہو جس میں شہر کی ساری بتیاں اک ساتھ ایک گھنٹے کو چپ کرا دی جایں شہر کے لوگ چھت پے بھیجے جایں ان کی تاروں سے جب نظر الجھے تب اندھیرے کا حسن ان پے کھلے کہکشاں ٹوٹ کر گری ان پر انکی آنکھوں کے زخم بھر جائیں مجھ کو گر انتخاب کرنا ہو میں اماوس کی رات کو چن لوں چاند کی غیر حاضری میں یہ بات صاف شاید زیادہ ہو ہم پر اپنا نقصان کر لیا ہے بہت ہم نے ایجاد روشنی کر کے -Swapnil-