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अप्रैल, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक ही ग़म तेरे जाने का रहा

एक ही ग़म तेरे जाने का रहा एक दिन वो भी मगर जाता रहा आज माँ का जी बहुत अच्छा रहा आज दिन भर रेडियो बजता रहा ख़ाब में खुलती रही खिड़की कोई और उस खिड़की में वो आता रहा लॉन में आया मुझे तेरा खयाल मैं वहीं फिर देर तक बैठा रहा  जह्न के कमरे में तेरा इक खयाल रात भर जलता रहा बुझता रहा  आख़िरश पीला ही पड़ना था अगर दिल का कागज़ बेसबब सादा रहा  एक नन्हा ख़ाब मेरी नींद में पाँव उचकाकर तुझे छूता रहा  इक उचटती सी नज़र उसकी लगी और मैं बिखरा तो फिर बिखरा रहा

याद तुम्हारी शक्कर निकली

धूप के भीतर छुप कर निकली तारीकी* सायों भर निकली रात गिरी थी इक गड्ढे में शाम का हाथ पकड़कर निकली रोया..उससे मिलकर रोया चाहत भेस बदल कर निकली फूल तो फूलों सा होना था तितली कैसी पत्थर निकली सूत हैं घर के हर कोने में मकड़ी पूरी बुनकर निकली ताजादम होने को उदासी लेकर ग़म का शॉवर निकली ग़म के कितने चींटे आये याद तुम्हारी शक्कर निकली हिज्र की शब से घबराते थे यार यही शब बेहतर निकली जब भी चोर मिरे घर आये एक हंसी ही ज़ेवर निकली ‘आतिश’ कुंदन रूह मिली है उम्र की आग में जलकर निकली *तारीकी - अँधेरा 

उजाले पलटकर किधर जायेंगे

उजाले पलटकर किधर जायेंगे फ़ज़ाओं में हर सू बिखर जायेंगे   यूँ ही ख़ाली-ख़ाली जो बीतेंगे दिन तो हम इक उदासी से भर जायेंगे  ख़ुदा तक पहुँचने की बाज़ीगरी? ज़रा ध्यान टूटा कि मर जायेंगे   ये सब लोग जो नींद में है, अभी कोई ख़ाब देखेंगे डर जायेंगे   कई दिन से मुझमे है इक शोर सा   ख़मोशी से ये दिन गुज़र जायेंगे   यही जिस्म आया है ले कर इधर इसी नाव से हम उधर जायेंगे   हमारा भी रस्ता उधर का ही है  कहीं बीच में हम उतर जायेंगे   इस आवारगी को कहीं छोड़कर  ये रस्ते किसी दिन तो घर जायेंगे   हम ‘आतिश’ हैं हमको नहीं कोई डर जलाओगे तुम हम संवर जायेंगे

अपने ख़ाबों को इक दिन सजाते हुए

अपने ख़ाबों को इक दिन सजाते हुए गिर पड़े चाँद-तारों को लाते हुए एक पुल पर खड़ा शाम का आफ़ताब* सबको तकता है बस आते जाते हुए एक पत्थर मिरे सर पे आ कर लगा कुछ फलों को शजर* से गिराते हुए ए ग़ज़ल तेरी महफ़िल में पायी जगह इक ग़लीचा बिछाते-उठाते हुए सुब्ह इक गीत कानों में क्या पड़ गया कट गया दिन वही गुनगुनाते हुए ज़ात से अपनी ‘आतिश’ था ग़ाफ़िल बहुत जल गया ख़ुद दिया इक जलाते हुए आफ़ताब - सूर्य  शजर - पेड़

ख़ाब मेरे घर बैठा है

नींद   से आ कर बैठा है ख़ाब मेरे घर बैठा है अक्स मिरा आईने में लेकर पत्थर बैठा है एक बगूला * यादों का   खा कर चक्कर बैठा है उसकी नींदों पर इक ख़ाब तितली बन कर बैठा है रात की टेबल बुक करके   चाँद डिनर पर बैठा है आ जाता है बाहर भी दिल में जो डर बैठा है अँधियारा खामोशी से ओढ़ के चादर बैठा है आतिश ’ धूप गयी कब की घर में क्यूँ कर बैठा है ? बगूला - चक्रवात