सोमवार, 29 जुलाई 2013

एक पुल पर/ ایک پل پر - nazm


वो एक पुल था
जहां मिला था
मैं आख़िरी बार तुमसे जानां
मुझे हमेशा की तरह
पुल के उस ओर जाना था मैं जिधर से
नदी को जाते हुए निहारूं
मगर तुम्हें पुल का वो ही हिस्सा
ज़ियादा भाया हमेशा जैसे
जिधर से तुम डूबते हुए
आफ़ताब को देख सकती थी
वहीं पे डूबी थी अपने रिश्ते की आख़िरी नब्ज़
वो एक पुल
जो मिला रहा था
नदी के इक तट को दूसरे से
वहीं मैं तुमसे अलग हुआ था..

وہ ایک پل تھا
جہاں ملا تھا 
میں آخری بار تم سے جاناں 
مجھے ہمیشہ کی طرح 
پل کے اس اور جانا تھا میں جدھر سے 
ندی کو جاتے ہوئے نہاروں 
مگر تمہیں پل کا وہ ہی حصّہ 
زیادہ بھیا ہمیشہ جیسے 
جدھر سے تم ڈوبتے ہوئے 
آفتاب کو دیکھ سکتی تھی 
وہیں پے ڈوبی تھی اپنے رشتے کی آخری نبض 
وہ ایک پل جو 
ملا رہا تھا 
ندی کے اک تٹ کو دوسرے سے 
وہیں میں تم سے الگ ہوا تھا

3 टिप्‍पणियां:

sehba jafri ने कहा…

lillah!
kitna dard hai is nazm me!
"khuda us musafir ki himmat badhaye
jo manzil ko thukraye manzil samjh kar"

स्वप्निल तिवारी 'आतिश' ने कहा…

sehba jafri ji.. bahut bahut shukriya aapka

lori ali ने कहा…

अलग अंदाज़ का अलग सा ब्लॉग.....पोस्ट छू गई दिल को