सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अगस्त, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ہاں دھنک کے رنگ سارے کھل گئے/हाँ धनक के रंग सारे खुल गए

ہاں دھنک کے رنگ سارے کھل گئے مجھ پے تیرے سب اشارے کھل گئے हाँ धनक के रंग सारे खुल गए मुझे पे तेरे सब इशारे खुल गए ایک تو ہم کھیل میں بھی تھے نۓ اس پے پتے بھی ہمارے کھل گئے एक तो हम खेल में भी थे नए उस पे पत्ते भी हमारे खुल गए جھیل میں آنکھوں کی تم اترے ہی تھے اور خابوں کے شکارے کھل گئے झील में आँखों की तुम उतरे ही थे और ख़ाबों के शिकारे खुल गए نرم ہی تھی یاد کی ہر پنکھڑی پھر بھی میرے زخم سارے کھل گئے नर्म ही थी याद की हर पंखुड़ी फिर भी मेरे ज़ख्म सारे खुल गए مجھکو جکڑے تھے کئی بندھن مگر تیرے بندھن کے سہارے کھل گئے मुझको जकड़े थे कई बंधन मगर तेरे बंधन के सहारे खुल गए -swapnil

wo khushbu badan thi-nazm

وو خوشبو بدن تھی مگر خود میں سمٹی سی اک امر تک یوں ہی بیٹھی رہی بس اک لمس کی منتظر اسے ایک شب جیوں ہی میں نے چھوا اس سے تتلی اڑی  پھر اک اور اک اور تتلی اڑی دیر تک تتلیاں یوں ہی اڑتی رہیں چھنٹی تتلیاں جب کہیں بھی نہ تھی وو تبھی سے تعقب میں ہوں تتلیوں کے کیے جا رہا ہوں انہیں میں اکٹھا  کہ اک روز انسے دوبارہ میں تخلیق اس کو کرونگا جو خوشبو بدن تھا وو خوشبو بدن تھا  -swapnil tiwari- वो ख़ुश्बू बदन थी मगर ख़ुद में सिमटी सी इक उम्र तक यूँ ही बैठी रही बस इक लम्स की मुन्तज़िर उसे एक शब ज्यों ही मैंने छुआ, उससे तितली उड़ी, फिर इक और इक और तितली उडी, देर तक तितलियाँ यूँ ही उडती रहीं छंटी तितलियाँ जब कहीं भी न थी वो तभी से तअक़्क़ुब में हूँ तितलियों के इकठ्ठा किये जा रहा हूँ इन्हें मैं के इक रोज़ इनसे दुबारा मैं तख़्लीक़ उसको करूँगा जो ख़ुश्बू बदन थी वो ख़ुश्बू बदन थी…. -swapnil tiwari-