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aisi achchhi soorat nikli pani ki-ghazal

ऐसी अच्छी सूरत निकली पानी की आँखें पीछे छूट गयीं सैलानी की कैरम हो, शतरंज हो या फिर इश्क़ ही हो खेल कोई हो हमने बेईमानी की दीवारों पर चाँद सितारे ले आये बच्चों ने की भी तो क्या शैतानी की क़ैद हुई हैं आँखें ख़ाब-जज़ीरे पर पा कर एक सज़ा-सी काले पानी की चाँद की गोली रात ने खा ही ली आखिर पहले तो शैतान ने आनाकानी की जलते दिये सा इक बोसा रख कर उसने चमक बढा दी है मेरी पेशानी की मैं उसकी आँखों के पीछे भागा था जब अफ़वाह उड़ी थी उनमें पानी की जब भी उसको याद किया हम बुझ बैठे ‘आतिश’ हमने अक्सर ये नादानी की aisi achchhi soorat nikli pani ki aaNkheN piichhe chhoot gayiiN sailani ki kairam ho, shatranj ho ya fir ishq hi ho khel koi ho hamne be-iimani ki diwaroN par chaaNd sitare le aaye bachchoN ne ki bhi to kya shaitani ki Qaid huii haiN aaNkheN khab-jaziire par pa kar ek saza-sii kale pani ki chaaNd ki goli raat ne kha hi li aakhir pahle to shaitan ne aanakani ki jalte diye sa ik bosah ra...

مسافر! تری تاک میں ہیں دھندھلکے/मुसाफ़िर ! तिरी ताक में हैं धुंधलके - ग़ज़ल

कहीं खो न जाना ज़रा दूर चल के मुसाफ़िर ! तिरी ताक में हैं धुंधलके मिरा नींद से आज झगडा हुआ है सो लेटे हैं दोनों ही करवट बदल के इसी डर से चलता है साहिल किनारे कहीं गिर न जाये नदी में फिसल के अजब बोझ पलकों पे दिन भर रहा है अगरचे तिरे खाब थे हलके हलके जताते रहे हम, सफ़र में हैं लेकिन भटकते रहे अपने घर से निकल के अँधेरे में मुबहम* हुआ हर नज़ारा मिली एक दूजे में हर शय पिघल के ज़माने से सारे शरर चुन ले ‘आतिश’ यही तो अनासिर* हैं तेरी ग़ज़ल के मुबहम- अस्पष्ट अनासिर - तत्व کہیں کھو نہ جانا ذرا دور چل کے  مسافر! تری تاک میں ہیں دھندھلکے  مرا نیند سے آج جھگڑا ہوا ہے  سو لیٹے ہیں دونو ہی  کروٹ  بدل کے اسی ڈر سے چلتا ہے ساحل کنارے  کہیں گر ن جائے ندی میں پھسل کے عجب بوجھ پلکوں پے دن بھر رہا ہے  اگرچہ ترے خواب تھے ہلکے ہلکے  جتاتے رہے ہم سفر میں ہیں لیکن  بھٹکتے رہے اپنے گھر سے نکل کے  زمانے سے سارے شرر چن لے 'آتش' یہی تو عناصر ہیں  تیری غزل کے    --  Regards Swapnil...

प्रिज़्म और पिरामिड

प्रिज़्म में इक उदासी भरी दुबली-पतली किरन, ऐसे दाख़िल हुई जैसे बाहर न आयेगी अब प्रिज़्म दिखने में तो इक पिरामिड सा ही होता है रौशनी का बदन लेकिन ऐसा नहीं बना कर ममी जिसको रक्खे वहाँ.. प्रिज़्म के सब फलक कोशिशें कर के भी जब बना ही न पाये किरन को ममी तो वो हंसने लगी और हँसते हुए अपनी सतरंगी चादर हवा में उड़ाने लगी...

हमेशा ही मुझको रही हड़बड़ी/ ہمیشہ ہی مجھ کو رہی ہڑبڑی-ghazal

हमेशा ही मुझको रही हड़बड़ी कहीं पर्स छूटा कहीं पर घडी कभी वक़्त भी बाँध पाऊँ यूँ ही कलाई पे बाँधी है जैसे घड़ी तिरी याद के एक झोंके से फिर मिरी नींद आँखों कि छत से उड़ी कि दरिया समंदर का क़ैदी हुआ   रवानी ही इसकी बनी हथकड़ी दिसंबर के जैसा तिरा हिज्र है   हुए छोटे दिन और रातें बड़ी   सहारा फक़त अपने साये का था   सही धूप हमने कड़ी से कड़ी टहलता रहा दिल के कमरे दुःख बजाते हुए अपनी बूढी छड़ी   अगर तुझमें   ' आतिश '  कोई आग है जला कर दिखा दे कोई फुलझड़ी ہمیشہ ہی مجھ کو رہی ہڑبڑی  کہیں پرس چھوٹا کہیں پر گھڑی  تری یاد کے ایک جھونکے سے پھر  مری نیند آنکھوں کی چھت سے اڑی  کبھی وقت بھی باںدھ پاؤں یوں ہی  کلائی پے باندھی ہے جیسے گھڑی  کہ دریا سمندر کا قیدی ہوا  روانی ہی اس کی بنی ہتھکڑی  دسمبر کے جیسا ترا ہجر ہے  ہوئے چھوٹے دن اور راتیں بڑی  ٹہلتا رہا اپنے کمرے میں دکھ  بجاتے ہوئے اپنے بوڑھی چھڑی  سہارا فقط اپنے سایے ک...

मेरे होटों को छुआ चाहती है

मेरे होटों को छुआ चाहती है ख़ामुशी! तू भी ये क्या चाहती है ? मेरे रस्ते से हटा चाहती है दिल की दीवार गिरा चाहती है मेरे कमरे में नहीं है जो कहीं अब वो खिड़की भी खुला चाहती है ज़िन्दगी! गर न उधेड़ेगी मुझे किसलिए मेरा सिरा चाहती है सारे हंगामे हैं परदे पर अब फ़िल्म भी ख़त्म हुआ चाहती है कब से बैठी है उदासी पे मिरी याद की तितली उड़ा चाहती है नूर मिट्टी में ही होगा उनकी ‘जिन चरागों को हवा चाहती है’ मेरे अन्दर है उमस इस दरजा मुझमें बारिश-सी हुआ चाहती है भोर आई है इरेज़र की तरह शब की तहरीर मिटा चाहती है आसमां में हैं सराबों-सी वो जिन घटाओं को हवा चाहती है चाँद का फूल है खिलने को फिर शाम अब शब को छुआ चाहती है फिर न लौटेगी मिरी आँखों में नींद रंगों-सी उड़ा चाहती है सारी दुनिया ही पिघल के ‘आतिश’ मेरे पैकर में ढला चाहती है

यू टर्न - नज़्म

ये रस्ता जो सीधा नज़र आ रहा है जिसे नाम देते हैं हम ज़िन्दगी का इसी रास्ते में छुपे हैं कई मोड़ जैसे किनारे लगी झाड़ियों में छिपा सांप कोई यही मोड़ अचानक कहीं से निकल कर फुंफकारते हैं अगर बच गये हम, तो उनकी इनायत वगरना फिर आगे कोई 'कट' नहीं है जहां हाथ देकर, के यू टर्न ले लें..