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jee men aata hai jaga den tumko-ghazal

छुप के किरनों में सदा दें तुमको जी में आता है जगा दें तुमको چھپ کے کرنوں میں سدا دیں تم کو  جی میں آتا ہے جگا دیں تم کو  मेरे साहिल पे न लिक्खी जाओ मेरी लहरें न मिटा दें तुमको میرے ساحل پے نہ لکھی جاؤ  میری لہریں نہ مٹا دیں تم کو रोज़ इक शाम का है ख़र्च इन पर ख़ाली कर दें न ये यादें तुमको روز اک شام کا ہے خرچ ان پر خالی کر دیں ن یہ یادیں تم کو वस्ल की शब में कहा था उसने आओ इक ख़ाब जुदा दें तुमको وصل کی شب میں کہا تھا اسنے آؤ اک خواب جدا دیں تمکو नींद के बाग़ में आओ इक दिन अपने कुछ ख़ाब चखा दें तुमको نیند کے باغ میں آؤ اک دن اپنے کچھ خواب چکھا دیں تم کو दिल के आँगन में किसी दिन यादें शोर की तरह मचा दें तुमको دل کے آنگن میں کسی دن یادیں شور کی طرح مچا دیں تمکو ? ज़िन्दगी ! ख़त्म करें ये रिश्ता ? अबके बिछड़ें तो भुला दें तुमको زندگی! ختم کریں یہ رشتہ؟ اب کے بچھڑیں تو بھلا دیں تم کو ؟ तुम जहां रक्खो सितारे अपने हम वो छोटा सा ख़ला दें तुमको تم جہاں رکھو ستارے اپنے ہم وو چھوٹا سا خلا دیں تم کو शहरे-दिल में तो नये हो ग़म तुम आओ ये शह्र घुमा दें तुमको شہرے دل میں تو نۓ ہو غم تم آؤ...

lafz mushayara-2012

Gayab kamra -nazm

घर के जिस कमरे में जाऊं इक कमरा, जो ग़ायब है हर कमरे में साथ मिरे आ जाता है ....जैसे मेरा साया हो माज़ी का वो ग़ायब कमरा बंद ही रहता है अक्सर जैसे उसको खोलने वाली उसके ताले के कानों में ‘खुल जा सिम सिम’ कहने वाली चाभी खो बैठा हूँ कहीं पर.. लेकिन अपने आप कभी उसका दरवाज़ा मुझको खुला मिलता है तो मैं उसके अन्दर बैठा घंटों रोता हूँ, और इक आदमक़द आईने पर जो धूल पड़ी मिलती है उस पर नाम तिरा लिखता हूँ گھر کے جس کمرے میں جاوں  اک کمرہ، جو غایب ہے ہر کمرے میں ساتھ میرے آ جاتا ہے جیسے میرا سایہ ہو....... ماضی کا وو غایب کمرہ  بند ہی رہتا ہے اکثر جیسے اسکو کھولنے والی اسکے تالے کے کانوں میں  'کھل جا سمسم کہنے والی چابھی کھو بیٹھا ہوں کہیں پر لیکن اپنے آپ کبھی  اسکا دروازہ مجھکو کھلا ملتا ہے تو گھنٹوں میں اسکے اندر بیٹھا روتا ہوں اور اک آدامقد آئینے پر جو دھول پدی ملتی ہے اس پر نام تیرا لکھتا ہوں

उदासी से सजे रहिये/اداسی سے سجے رہئے -ghazal

उदासी से सजे रहिये कोई रुत हो हरे रहिये सभी के सामने रहिये मगर जैसे छिपे रहिये किसी दिन हाथ आयेगा त’अक्कुब में लगे रहिये जो डूबी है सराबों में वो कश्ती ढूंढते रहिये वो पहलू जैसे साहिल है तो साहिल से लगे रहिये पड़े रहना भी अच्छा है मुहब्बत में पड़े रहिये भंवर कितने भी प्यारे हों किनारे पर टिके रहिये समय है गश्त पर हर पल जहां भी हों छिपे रहिये ख़ुदा गुज़रे न जाने कब ख़ला में देखते रहिये रज़ाई खींचिए सर तक सहर को टालते रहिये न जाने कब सहर हो जाय मुसलसल जागते रहिये न कट जाये पतंगों सा फ़लक को देखते रहिये वो ऐसे होंट हैं के बस हमेशा चूमते रहिये यही करता है जी ‘आतिश’ कि अब तो बस बुझे रहिये اداسی سے سجے رہئے  کوئی رت ہو ہرے رہئے  سبھی کے سامنے رہئے  مگر جیسے چھپے رہئے  جو ڈوبی ہے سرابوں میں  وو کشتی ڈھونڈھتے رہئے     وہ  پہلو جیسے ساحل ہے  تو ساحل سے لگے رہئے  پڑے رہنا بھی اچّھا ہے  محبّت میں پڑے رہئے  بھنور کتنے بھی پیارے ہوں  کنارے پر ٹیکے رہئے...

aisi achchhi soorat nikli pani ki-ghazal

ऐसी अच्छी सूरत निकली पानी की आँखें पीछे छूट गयीं सैलानी की कैरम हो, शतरंज हो या फिर इश्क़ ही हो खेल कोई हो हमने बेईमानी की दीवारों पर चाँद सितारे ले आये बच्चों ने की भी तो क्या शैतानी की क़ैद हुई हैं आँखें ख़ाब-जज़ीरे पर पा कर एक सज़ा-सी काले पानी की चाँद की गोली रात ने खा ही ली आखिर पहले तो शैतान ने आनाकानी की जलते दिये सा इक बोसा रख कर उसने चमक बढा दी है मेरी पेशानी की मैं उसकी आँखों के पीछे भागा था जब अफ़वाह उड़ी थी उनमें पानी की जब भी उसको याद किया हम बुझ बैठे ‘आतिश’ हमने अक्सर ये नादानी की aisi achchhi soorat nikli pani ki aaNkheN piichhe chhoot gayiiN sailani ki kairam ho, shatranj ho ya fir ishq hi ho khel koi ho hamne be-iimani ki diwaroN par chaaNd sitare le aaye bachchoN ne ki bhi to kya shaitani ki Qaid huii haiN aaNkheN khab-jaziire par pa kar ek saza-sii kale pani ki chaaNd ki goli raat ne kha hi li aakhir pahle to shaitan ne aanakani ki jalte diye sa ik bosah ra...

مسافر! تری تاک میں ہیں دھندھلکے/मुसाफ़िर ! तिरी ताक में हैं धुंधलके - ग़ज़ल

कहीं खो न जाना ज़रा दूर चल के मुसाफ़िर ! तिरी ताक में हैं धुंधलके मिरा नींद से आज झगडा हुआ है सो लेटे हैं दोनों ही करवट बदल के इसी डर से चलता है साहिल किनारे कहीं गिर न जाये नदी में फिसल के अजब बोझ पलकों पे दिन भर रहा है अगरचे तिरे खाब थे हलके हलके जताते रहे हम, सफ़र में हैं लेकिन भटकते रहे अपने घर से निकल के अँधेरे में मुबहम* हुआ हर नज़ारा मिली एक दूजे में हर शय पिघल के ज़माने से सारे शरर चुन ले ‘आतिश’ यही तो अनासिर* हैं तेरी ग़ज़ल के मुबहम- अस्पष्ट अनासिर - तत्व کہیں کھو نہ جانا ذرا دور چل کے  مسافر! تری تاک میں ہیں دھندھلکے  مرا نیند سے آج جھگڑا ہوا ہے  سو لیٹے ہیں دونو ہی  کروٹ  بدل کے اسی ڈر سے چلتا ہے ساحل کنارے  کہیں گر ن جائے ندی میں پھسل کے عجب بوجھ پلکوں پے دن بھر رہا ہے  اگرچہ ترے خواب تھے ہلکے ہلکے  جتاتے رہے ہم سفر میں ہیں لیکن  بھٹکتے رہے اپنے گھر سے نکل کے  زمانے سے سارے شرر چن لے 'آتش' یہی تو عناصر ہیں  تیری غزل کے    --  Regards Swapnil...