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चांदनी मुझ से भी कभी बिखरे/چاندنی مجھ سے بھی کبھی بکھرے

चांदनी मुझ से भी कभी बिखरे दाग़ मुझ में हैं चाँद से गहरे चोट करते हुए छुपा दी थी अपनी तस्वीर घाव में तेरे धूप की इक नदी में उतरा हूँ ले के पलकों पे ख़्वाब के क़तरे ये शरर ही कहानियां हैं मिरी उड़ते हैं जो अलाव से मेरे वरना मरकज़ नहीं मैं नुक़्ता हूँ मुझको रहते हैं दायरे घेरे एक रनवे पे दौड़ते हैं हम और रोज़े-अज़ल के हैं उतरे कब तलक मैं हरा रहूँगा भला चार जानिब हैं काठ के चेहरे उस के सब राज़दार डूब गए शाम के राज़ थे बड़े गहरे शोर करते हैं जिस्म की तह में तेरे ख़ामोश लम्स के क़तरे बीच रस्ते में इक सराय मिली अश्क गालों पे आ के टुक ठहरे چاندنی مجھ سے بھی کبھی بکھرے داغ میرے ہیں چاند سے گہرے چوٹ کرتے ہوئے چھپا دی تھی اپنی تصویر گھاؤ میں تیرے دھوپ کی اک ندی میں اترا ہوں لے کے پلکوں پہ خواب کے قطرے یہ شرر ہی کہانیاں ہیں مری اڑتے ہیں جو الاؤ سے میرے ورنہ مرکز نہیں میں نقطہ ہوں مجھ کو رہتے ہیں دائرے گھیرے ایک رن وے پہ دوڑتے ہیں ہم اور روزے ازل کے ہیں اترے کب تلک میں ہرا راہوں گا بھلا چار جانب ہیں کاٹھ کے چہرے اس کے سب رازدار ڈوب گئے شام کے راز تھے ب...

छुपी नहीं हैं शक्ल रात में भी रहगुज़ार की/چھپی نہیں ہے شکل رات میں بھی رہگزار کی

छुपी नहीं हैं शक्ल रात में भी रहगुज़ार की है रौशनी फ़ज़ा में पुरउम्मीद इंतज़ार की अजीब ताल-मेल है हमारी चाल-ढाल में जमी हुई है मुझ पे ही नज़र मिरे शिकार की न जाने कैसा ग़म पिला दिया है तूने दिल इसे हमारी शब को लत सी लग गयी है तेरे बार की नए सुरों की कोंपले उगें मुझे सदा तो दे कि गिर चुकी है एक-एक धुन मिरे सितार की न जाने क्या बरस रहा है ओट बर्फ़ की लिए गिरी पड़ी हैं पत्तियाँ तमाम देवदार की मैं तेरे दोस्तों से ख़ूब मिल रहा हूँ आजकल है मेरे पास आज तेरी याद भी उधार की बहुत घनी है याद तेरी , बस के अब मैं रो पडूँ कमी है बन में आज सिर्फ़ एक आबशार की ये कौन है जो रुत के रथ पे इन दिनों सवार है उड़ा रहा है धूल जो फ़ज़ाओं में बहार की वो चाँद का भंवर हमें तो ले ही डूबता मगर तेरे ख़याल के बहाव में ये शब भी पार की   چھپی نہیں ہے شکل رات میں بھی رہگزار کی ہے روشنی فضا میں پر امید انتظار کی   عجیب تال میل ہے ہماری چال ڈھال میں جمی ہوئی ہے مجھ پہ ہی نظر مرے شکار کی   نہ جانے کیسا غم پلا دیا ہے تو نے دل اسے ہماری شب کو لت سی لگ گئ...

तुझ से वाबस्ता कोई और कहानी लाऊँ/تجھ سے وابستہ کوئی اور کہانی لاؤں

रंग में तेरे रंगी हो वो उदासी लाऊँ तुझ से वाबस्ता कोई और कहानी लाऊँ घूम फिर कर मुझे याद आना है इक वो ही शख़्स अब कहाँ से मैं कोई दूसरा माज़ी लाऊँ पहले तो ध्यान में लाऊँ तिरा उजला चेहरा फिर गुमाँ में मैं तिरी नर्म सदा भी लाऊँ इस जज़ीरे पे मिरे क़त्ल का इलज़ाम तो है पर कहाँ से मैं समंदर की गवाही लाऊँ तब कहीं जा के मसाइल मैं सुनूँ अपने भी ख़ुद से मिलने पे सिफ़ारिश जो तुम्हारी लाऊँ देर तक ठहरेगा दुःख का ये ज़रा सा लम्हा अब बता कैसे कहानी में रवानी लाऊँ तेरे साये की सदा से वो अचानक भर जाय धूप का कासा मैं तेरे लिए ख़ाली लाऊं رنگ میں تیرے رنگی ہو وو اداسی لاؤں تجھ سے وابستہ کوئی اور کہانی لاؤں گھوم پھر کر مجھے یاد آنا ہے اک وو ہی شخص اب کہاں سے میں کوئی دوسرا ماضی لاؤں پہلے تو دھیان میں لاؤں ترا اجلا چہرہ پھر گماں میں میں تری نرم صدا بھی لاؤں اس جزیرے پہ مرے قتل کا الزام تو ہے پر کہاں سے میں سمندر کی گواہی لاؤں تب کہیں جا کے مسائل میں سنوں اپنے بھی خود سے ملنے پہ سفارش جو تمھاری لاؤں دیر تک ٹھہرے گا دکھ کا یہ ذرا سا لمحہ اب بتا کیسے کہانی میں روانی لاؤں ترے سائے کی صدا سے وو اچانک بھر جائے دھوپ کا کا...

کیسی کیسی خوبصورت کتنی پیاری مچھلیاں/कैसी कैसी ख़ूबसूरत कितनी प्यारी मछलियाँ

कैसी कैसी ख़ूबसूरत कितनी प्यारी मछलियाँ जाल में पानी के फँस जाती हैं सारी मछलियाँ शाम होते ही उदासी चल पड़ी चुनने उन्हें दिन के साहिल पर पड़ी हैं ग़म की मारी मछलियाँ दिल के दरिया में जो आई शाम चारा फेंकनें सत्ह पर आने लगीं यादों की सारी मछलियाँ अश्क गर सूखे तो सारे ख़ाब मारे जायेंगे सह नहीं पाएंगी इतनी अश्कबारी मछलियाँ इक जज़ीरा बस वही सारे समंदर में है पर ताक में बैठी हुई हैं वां शिकारी मछलियाँ ख़ुश नहीं हूँ पार करके भी तुम्हे मैं जाने क्यूँ ओ समंदर ! याद आती हैं तुम्हारी मछलियाँ کیسی کیسی خوبصورت کتنی پیاری مچھلیاں جال میں پانی کے پھنس جاتی ہیں ساری مچھلیاں شام ہوتے ہی اداسی چل پڑی چننے انھیں دل کے ساحل پر پڑی ہیں غم کی ماری مچھلیاں دل کے دریا میں جو آی شام چارہ پھینکنے سطح پر آنے لگیں یادوں کی ساری مچھلیاں اشک گر سوکھے تو سارے خواب مارے جائنگے سہ نہیں پائنگی اتنی اشکباری مچھلیاں اک جزیرہ بس وہی سارے سمندر میں ہے پر تاک میں بیٹھی ہی ہیں واں شکاری مچھلیاں خوش نہیں ہوں پار کرکے بھی تمہیں میں جانے کیوں او سمندر ! یاد آتی ہیں تمھاری مچھلیاں -swapnil-

मौसमे-हिज्र का हर वार संभाले हुए हैं/موسم ہجر کا ہر وار سنبھالے ہوئے ہیں

मौसमे-हिज्र का हर वार संभाले हुए हैं हम तिरी याद की बौछार संभाले हुए हैं موسم ہجر کا ہر وار سنبھالے ہوئے ہیں ہم تری یاد کی بوچھار سنبھالے ہوئے ہیں दश्त के हो चुके सारे कि जो दीवाने थे हुस्ने-जानाँ को तो हुशियार संभाले हुए हैं دشت کے ہو چکے سارے کہ جو دیوانے تھے حسن جاناں کو تو ہوشیار سنبھالے ہوئے ہیں इश्क़ और मैं तो हमआहंग हैं कब से कि मुझे उसकी ऊँगली से जुड़े तार संभाले हुए हैं عشق اور میں تو ہم آہنگ ہیں کب سے کہ مجھے اسکی انگلی سے جوڈے تار سنبھالے ہوئے ہیں तुम गुज़र सकते हो कतरा के सफ़ीने वालो हम तो दरिया हैं सो मँझधार संभाले हुए हैं تم گزر سکتے ہو کترا کے سفینے والو ہم تو دریا ہیں سو منجھدھار سنبھالے ہوئے ہیں वो किसी और फ़साने ही से हैं वाबस्ता मुझ-कहानी को जो किरदार संभाले हुए हैं وو کسی اور فسانے ہی سے ہیں وابستہ مجھ کہانی کو جو کردار سنبھالے ہوئے ہیں गिर के टूटेगी अभी एक छनाके के साथ इक हंसी जिसको ये रुख़सार संभाले हुए हैं گر کے ٹوتگی ابھی ایک چھناکے کے ساتھ اک ہنسی جس کو یہ رخسار سنبھلے ہوئے ہیں नींव से शोर सा उठता है इक ‘हैया हो’ का ये वो साये हैं जो दीवार ...

सोन मछली-कहानी

एक शह्र था जिसमें थोड़ी सी दिल्ली, थोड़ी मुंबई, थोडा बनारस, थोडा कलकत्ता, थोडा पटना, इत्यादि ठीक वैसे ही थे जैसे दिल्ली में थोडा पटना, थोडा कलकत्ता, थोडा बनारस इत्यादि हैं । उस शह्र में शायद बिहार का या उत्तर प्रदेश का या शायद मध्यप्रदेश का एक लड़का था, जो शायद आई ए एस, या आय आय टी, या शायद एम् बी बी एस की तैयारी कर रहा था। वह तैयारी करता जा रहा था, परीक्षा देता जा रहा था, लेकिन क़िस्मत हमेशा उससे कतरा के निकल जा रही थी। उम्र एक ऐसी रेत-घड़ी है जिसे ऊपर की सारी रेत नीचे गिर जाने के बाद उल्टा नहीं किया जा सकता और यही बात उसे खाए जा रही थी। उसने हर तरीका आज़मा लिया था। मंदिरों में मन्नत मांग कर, पीपल पे धागे बाँध कर, दरगाह में चादर चढ़ कर, बाहों पर ताबीज़ बंधवा कर, चर्च में मोमबत्तियां जला कर वह थक चुका था। लेकिन किसी भी तरह के ख़ुदा से उसे मदद नहीं मिली थी। कुछ और टोटके भी किये थे उसने। होटल खाना खाने जाता तो एक रोटी बचा के ले आता और गौमाता को खिलाता था। मंगलवार को व्रत रखता था। कमरे से परीक्षा देने के लिए निकलता था तो ख़ुद ही दो गिलासों में पानी भर के दरवाज़े के दोनों तरफ़ रखता और दही चाट लेता ...

सब के सब सिर्फ तेरी बात ही करना चाहें/سب کے سب صرف تری بات ہی کرنا چاہیں-ghazal

दिल , ज़बां , ज़हन मेरे आज संवरना चाहें सब के सब सिर्फ तेरी बात ही करना चाहें دل زباں ذھن مرے آج سنورنا چاہیں سب کے سب صرف تری بات ہی کرنا چاہیں  दाग़ हैं हम तेरे दामन के सो ज़िद्दी भी हैं हम कोई रंग नहीं हैं के उतरना चाहें داغ ہیں ہم ترے دامن کے سو ضدی بھی ہیں ہم کوئی رنگ نہیں ہیں کے اترنا چاہیں आरज़ू है हमें सहरा की सो हैं भी सैराब ख़ुश्क हो जाएँ हम इक पल में जो झरना चाहें آرزو ہے ہمیں سہرا کی سو ہیں بھی سیراب خشک ہو جاہیں ہم اک پل میں جو جھرنا چاہیں  ये बदन है तेरा , ये आम सा रस्ता तो नहीं इसके हर मोड़ पे हम सदियों ठहरना चाहें یہ بدن ہے تیرا یہ عام سا رستہ تو نہیں اس کے ہر موڈ پے ہم صدیوں ٹھہرنا چاہیں ये सहर है तो भला चाहिए किसको ये के हम शब की दीवार से सर फोड़ के मरना चाहें یہ سحر ہے تو بھلا چاہئے کیسکو یہ کہ ہم شب کی دیوار سے سر پھوڑکے مارنا چاہیں जैसे सोये हुए पानी में उतरता है सांप हम भी चुपचाप तेरे दिल में उतरना चाहें جیسے سوئے ہوئے پانی میں اترتا ہے سانپ ہم بھی چپ چاپ ترے دل میں اترنا چاہیں  आम से शख़्स...