उदासी से सजे रहिये कोई रुत हो हरे रहिये सभी के सामने रहिये मगर जैसे छिपे रहिये किसी दिन हाथ आयेगा त’अक्कुब में लगे रहिये जो डूबी है सराबों में वो कश्ती ढूंढते रहिये वो पहलू जैसे साहिल है तो साहिल से लगे रहिये पड़े रहना भी अच्छा है मुहब्बत में पड़े रहिये भंवर कितने भी प्यारे हों किनारे पर टिके रहिये समय है गश्त पर हर पल जहां भी हों छिपे रहिये ख़ुदा गुज़रे न जाने कब ख़ला में देखते रहिये रज़ाई खींचिए सर तक सहर को टालते रहिये न जाने कब सहर हो जाय मुसलसल जागते रहिये न कट जाये पतंगों सा फ़लक को देखते रहिये वो ऐसे होंट हैं के बस हमेशा चूमते रहिये यही करता है जी ‘आतिश’ कि अब तो बस बुझे रहिये اداسی سے سجے رہئے کوئی رت ہو ہرے رہئے سبھی کے سامنے رہئے مگر جیسے چھپے رہئے جو ڈوبی ہے سرابوں میں وو کشتی ڈھونڈھتے رہئے وہ پہلو جیسے ساحل ہے تو ساحل سے لگے رہئے پڑے رہنا بھی اچّھا ہے محبّت میں پڑے رہئے بھنور کتنے بھی پیارے ہوں کنارے پر ٹیکے رہئے...
हँस के बीमार कर दिया देखो, तुम ने अच्छी भली उदासी को -स्वप्निल तिवारी